वन नेशन वन इलेक्शन पर संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट में कोई जल्दबाजी नहीं, अध्यक्ष पीपी चौधरी का बड़ा बयान|

संसद की संयुक्त समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने कहा कि सभी हितधारकों की राय लेने के बाद ही एक देश एक चुनाव पर सिफारिशें दी जाएंगी।

Update: 2026-07-02 04:30 GMT

नई दिल्ली में 'एक देश, एक चुनाव' के विषय पर आयोजित प्रेस वार्ता में बोलते हुए समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी।

'एक देश, एक चुनाव' से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयकों पर विचार-विमर्श कर रही संसद की संयुक्त समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने स्पष्ट किया है कि समिति को अपनी रिपोर्ट सौंपने की कोई जल्दबाजी नहीं है। राजस्थान के पाली से भाजपा सांसद और समिति के अध्यक्ष चौधरी ने बुधवार को एक प्रेस वार्ता के दौरान यह बात कही। उन्होंने जोर देकर कहा कि 'एक देश, एक चुनाव' जैसे बड़े चुनावी सुधार पर कोई भी अंतिम सिफारिश तैयार करने से पहले सभी संबंधित पक्षों और हितधारकों की राय को विस्तार से सुना जाएगा।

समिति के अध्यक्ष ने इस बात को पूरी तरह खारिज कर दिया कि इस मामले में सरकार की ओर से कोई दबाव बनाया जा रहा है। चौधरी ने कहा कि सरकार और संसद दोनों का यह स्पष्ट मानना है कि सभी हितधारकों की बात सुनी जानी चाहिए ताकि यह पारदर्शी तरीके से पता चल सके कि देश की जनता और विभिन्न संगठन वास्तव में क्या चाहते हैं। यह बयान संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 को लेकर दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता के साथ समिति की हुई बैठक के बाद सामने आया है। पीपी चौधरी ने यह भी रेखांकित किया कि यह विधेयक पूरी तरह देश के हित में है और इसका किसी विशेष राजनीतिक दल या सरकार के फायदे से कोई लेना-देना नहीं है।

समिति इस समय विभिन्न राज्य सरकारों, संवैधानिक अधिकारियों, राजनीतिक दलों और अन्य संबंधित पक्षों से लगातार संपर्क में है। इस राष्ट्रव्यापी विचार-विमर्श का मुख्य उद्देश्य एक साथ चुनाव कराने से पड़ने वाले संवैधानिक, कानूनी, प्रशासनिक और चुनावी प्रभावों की गहराई से पड़ताल करना है। इससे पहले समिति ने दिल्ली सचिवालय में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और दिल्ली सरकार के मंत्रियों के साथ भी इस विषय पर अहम चर्चा की थी। पीपी चौधरी ने विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सिर्फ इसलिए इस बड़े सुधार का विरोध नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इस मुद्दे को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने हाथ में लिया है। उन्होंने कहा कि किसी भी विरोध का एक ठोस और तार्किक आधार होना आवश्यक है।

बैठक के दौरान दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने भी इस व्यवस्था के ऐतिहासिक संदर्भों को सामने रखा। उन्होंने कहा कि देश की आजादी के शुरुआती दशकों में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना एक सामान्य प्रक्रिया थी। हालांकि, बाद के वर्षों में बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों और समय से पहले विधानसभाओं के भंग होने के कारण यह चक्र टूट गया और चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे। संयुक्त समिति इन सभी ऐतिहासिक और प्रशासनिक चुनौतियों का अध्ययन कर रही है और व्यापक विचार-विमर्श के पूरा होने के बाद ही संसद को अपनी अंतिम सिफारिशें सौंपेगी।

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