भारत-इजरायल संबंध: गादी आइजेनकोट के संभावित प्रधानमंत्री बनने से कूटनीति पर क्या होगा असर
इजरायल में सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट के बीच भारत के लिए रणनीतिक और कूटनीतिक रूप से क्यों अहम हैं आने वाले बदलाव?
तस्वीर में भारत-इजरायल द्विपक्षीय संबंधों और रक्षा सहयोग के बीच नेताओं का रणनीतिक संवाद।
नई दिल्ली, एजेंसी। इजरायल में सत्ता परिवर्तन की बढ़ती संभावनाओं ने भारत के सामने नई कूटनीतिक परिस्थितियां खड़ी कर दी हैं। चुनाव के बाद पूर्व रक्षा प्रमुख और 'याशर' पार्टी के नेता गादी आइजेनकोट सरकार बनाने की कोशिशों में आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। यदि वह प्रधानमंत्री बनते हैं तो भारत और इजरायल के दशकों पुराने संबंधों की दिशा, रक्षा सहयोग और पश्चिम एशिया की राजनीति पर उनके फैसलों का असर देखने को मिल सकता है।
विदेश मामलों के जानकारों के अनुसार, भारत और इजरायल के बीच रक्षा, तकनीक, कृषि और व्यापार के क्षेत्र में मजबूत संबंध हैं। ऐसे में इजरायल में सरकार बदलने से द्विपक्षीय रिश्तों में तत्काल किसी बड़े बदलाव की आशंका कम है। हालांकि, नई सरकार क्षेत्रीय सुरक्षा, फलस्तीन के मुद्दे और ईरान के साथ तनाव को किस तरह संभालती है, यह भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण होगा।
भारत-इजरायल संबंधों में रक्षा सहयोग सबसे मजबूत स्तंभों में से एक है। दोनों देशों के बीच मिसाइल प्रणालियों, ड्रोन, रडार, निगरानी उपकरणों और आधुनिक सैन्य तकनीक के क्षेत्र में लंबे समय से सहयोग जारी है। गादी आइजेनकोट के नेतृत्व में नई सरकार बनने की स्थिति में इस सहयोग में बड़े बदलाव की संभावना कम मानी जा रही है। इजरायल की सुरक्षा चुनौतियां और भारत की रक्षा जरूरतें दोनों देशों को एक-दूसरे के करीब बनाए रख सकती हैं।
ईरान और पश्चिम एशिया की राजनीति पर भी भारत की नजर रहेगी। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाती रही है। गादी आइजेनकोट भी इजरायल की सुरक्षा और ईरान से पैदा होने वाले खतरों को लेकर कड़ा रुख रखते हैं। ऐसे में उनके प्रधानमंत्री बनने पर ईरान के प्रति इजरायल की नीति में किसी बुनियादी बदलाव की उम्मीद नहीं है।
हालांकि, आइजेनकोट ने इजरायल की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने और कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया है। इससे नई सरकार के क्षेत्रीय तनाव कम करने और पश्चिमी देशों के साथ संबंध बेहतर बनाने की कोशिश करने की संभावना है। भारत के लिए पश्चिम एशिया में तनाव कम करने की ऐसी पहल सकारात्मक साबित हो सकती है।
फलस्तीन का मुद्दा भारत के सामने एक और बड़ी कूटनीतिक चुनौती बना रहेगा। भारत लंबे समय से इजरायल के साथ मजबूत संबंध बनाए रखने के साथ-साथ फलस्तीन के स्वतंत्र राष्ट्र के अधिकार का भी समर्थन करता रहा है। नेतन्याहू सरकार की गाजा और पश्चिमी तट से जुड़ी नीतियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना होती रही है। आइजेनकोट के सत्ता में आने पर इन नीतियों के कुछ पहलुओं में बदलाव की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, उन्होंने भी अपने शासन में फलस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का समर्थन नहीं किया है।
व्यापार और तकनीक के क्षेत्र में भी दोनों देशों के संबंधों पर नई सरकार के फैसलों का असर महत्वपूर्ण रहेगा। भारत और इजरायल के बीच व्यापार अब हीरा, पेट्रोलियम और रसायनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स, चिकित्सा उपकरण, संचार और उच्च तकनीक जैसे क्षेत्रों तक पहुंच चुका है। वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र को छोड़कर व्यापार करीब 3.75 अरब डॉलर रहा। कृषि और जल प्रबंधन भी द्विपक्षीय सहयोग के प्रमुख क्षेत्र हैं।
भारत, इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका के बीच आई2यू2 समूह तथा भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (आईएमईसी) जैसी पहलें भी दोनों देशों के रणनीतिक और आर्थिक संबंधों के लिए अहम हैं। इन परियोजनाओं का उद्देश्य व्यापार, परिवहन और क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ावा देना है। ऐसे में पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव या इजरायल की क्षेत्रीय नीति में बदलाव इन महत्वाकांक्षी योजनाओं की रफ्तार को प्रभावित कर सकता है।
फिलहाल इजरायल में सरकार गठन की प्रक्रिया पर सबकी नजरें टिकी हैं। चुनाव के बाद 120 सदस्यीय संसद में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। पांच नवंबर को राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग के साथ विचार-विमर्श के दौरान 67 सांसदों ने गादी आइजेनकोट का समर्थन किया। हालांकि, राष्ट्रपति ने कहा कि रविवार को सरकार बनाने के लिए उम्मीदवार का नाम तय कर देंगे।
ऐसे में इजरायल में सत्ता परिवर्तन की संभावनाओं के बीच भारत की निगाहें नई सरकार के नेतृत्व और उसकी विदेश नीति पर रहेंगी। रक्षा सहयोग की निरंतरता, ईरान के साथ तनाव, फलस्तीन के प्रति रुख और पश्चिम एशिया में आर्थिक संपर्क की परियोजनाएं आने वाले समय में भारत-इजरायल संबंधों की दिशा तय करने वाले प्रमुख मुद्दे होंगे।