गन्ना मूल्य विवाद में पिस रहा किसान, संदीप मुसळे की ‘औंदा’ कविता में छलका दर्द
गन्ना मूल्य विवाद के बीच सूखती फसल, बारिश की कमी और बढ़ते कर्ज से किसान परेशान हैं। संदीप मुसळे की ‘औंदा...!’ कविता में नेताओं की राजनीति, चीनी मिलों की अनिश्चितता और किसानों की दिवाली पर मंडराते आर्थिक संकट का चित्रण किया गया है।
कोल्हापुर के खेतों में सूखे गन्ने के बीच खड़े होकर अपनी फसल और कर्ज के संकट से परेशान आंसू पोछते एक किसान की यह तस्वीर।
कोल्हापुर। गन्ने की कीमत का विवाद, बारिश की बेरुखी, खेतों में सूखती फसल, बढ़ता कर्ज और आर्थिक संकट से जूझते किसानों की बदहाल स्थिति का मार्मिक चित्रण संदीप मुसळे ने अपनी कविता ‘औंदा...!’ में किया है। उन्होंने गन्ना मूल्य के मुद्दे पर जारी राजनीति, नेताओं के बीच मतभेद और आर्थिक संकट में फंसे किसानों की बेबसी को कविता के माध्यम से उजागर किया है।
दिवाली पड़वा आ गया है, लेकिन चीनी मिलों की चिमनियां कब चालू होंगी, इसे लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। गन्ने की कीमत का विवाद नहीं सुलझने से किसान असमंजस में हैं। रोजाना होने वाली बैठकों, चर्चाओं और आंदोलनों के बीच नेताओं के बीच सहमति नहीं बन पा रही है। खेतों में गन्ने की फसल सूख रही है, लेकिन किसानों की समस्याओं का कोई ठोस समाधान सामने नहीं आ रहा है। इसी स्थिति पर कवि ने अपनी चिंता व्यक्त की है।
बारिश के मुंह मोड़ लेने से बांधों में पानी का भंडार कम हो गया है। कुएं सूख चुके हैं और नदियों का जलस्तर घट गया है। फसलों को पानी नहीं मिल रहा है, वहीं गन्ने की कीमत को लेकर चल रही राजनीति में किसानों की परेशानियों की अनदेखी किए जाने की पीड़ा भी कविता में सामने आई है।
‘कोई कहता है कीमत बढ़ाओ, कोई कहता है परिवहन रोक दो’ इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ने गन्ना मूल्य के मुद्दे पर अलग-अलग रुख अपनाने वाले नेताओं पर टिप्पणी की है। दिन-रात मेहनत और पसीना बहाकर तैयार की गई गन्ने की फसल का हिसाब भी किसानों के पैरों तले रौंदा जा रहा है। खेतों में गन्ना सूख रहा है, किसानों का पैसा अटका हुआ है और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। ऐसे हालात में किसान अपने परिवार का खर्च कैसे चलाएंगे, यह सवाल भी कविता के माध्यम से उठाया गया है।
‘गन्ना मूल्य के नाम पर हर साल जिंदगी का खेल’ इन शब्दों में कवि ने प्रतिवर्ष सामने आने वाले गन्ना मूल्य संघर्ष की गंभीरता को रेखांकित किया है। किसान और राजनेताओं के बीच आखिर कब वास्तविक समन्वय स्थापित होगा, यह सवाल भी उन्होंने उठाया है।
कविता के अंतिम हिस्से में ‘मीठी चीनी ने धोखा दिया, अब कैसी दिवाली’ जैसी पंक्तियों के माध्यम से किसानों के त्योहार की खुशियों पर आर्थिक संकट की छाया को व्यक्त किया गया है। किसानों की इस पीड़ा और उनकी पुकार पर समाज तथा व्यवस्था को गंभीरता से ध्यान देने का संदेश कविता में दिया गया है।
‘औंदा...!’ केवल एक कविता नहीं, बल्कि गन्ना उत्पादक किसानों की पीड़ा, संघर्ष और बेचैनी की शब्दों में व्यक्त हुंकार है। संदीप मुसळे ने इसके माध्यम से गन्ना मूल्य विवाद और किसानों की आर्थिक परेशानियों को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा है।