MPSC पेपर लीक विवाद: विपक्ष के घेराव और 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पर सियासत
महाराष्ट्र में एमपीएससी पेपर लीक को लेकर MVA पर उठे सवाल, वहीं गुजरात में 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह के आयोजन पर राज ठाकरे ने उठाए मुद्दे।
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महाराष्ट्र में ‘एमपीएससी’ परीक्षा की पेपरफुटी को लेकर राजनीतिक माहौल गरम है। इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी ही, लेकिन विरोधियों द्वारा विद्यार्थियों के कंधे पर बंदूक रखकर राजनीतिक हित साधने की कोशिश को लेकर सवाल उठ रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं सहित हर स्तर पर पेपरफुटी अक्षम्य है, लेकिन यदि इसमें विद्यार्थियों के हित से अधिक राजनीतिक लाभ दिखाई दे तो यह भी गंभीर मुद्दा है।
खासदार सुप्रिया सुळे और आमदार रोहित पवार ने पेपरफुटी के मुद्दे पर सरकार को घेरा है। हालांकि, जब राज्य में उनकी ही सत्ता थी, तब ऐसी घटनाओं पर सुविधाजनक तरीके से आंखें मूंद लेने के सवाल भी सामने आते हैं।
2021 में महाविकास आघाड़ी सरकार के कार्यकाल में ‘टीईटी’ पेपरफुटी, ‘म्हाडा’ प्रश्नपत्रिका लीक और ‘एमआईडीसी’ भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी के मामले सामने आए थे। इन घटनाओं को लेकर सवाल उठता है कि क्या रोहित पवार और सुप्रिया सुळे इन्हें भूल गए हैं। खास बात यह है कि उस समय ‘म्हाडा’ प्रश्नपत्रिका लीक मामले की जांच चल रही थी। इसी दौरान मामले के मुख्य सूत्रधार ‘जी. ए. सॉफ्टवेयर टेनोलॉजिस’ कंपनी के संचालक डॉ. प्रीतीश देशमुख के घर की तलाशी में शिक्षक पात्रता परीक्षा का प्रवेशपत्र और उम्मीदवारों के नाम वाली सूची बरामद हुई थी।
सवाल यह भी है कि उस समय तत्कालीन सरकार ने इस घटना को लेकर कौन-कौन से कदम उठाए थे? आज के मुख्यमंत्री से इस संबंध में सवाल पूछने वाली खा. सुप्रिया सुळे ने 2021 में तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से इस मामले को लेकर कौन-कौन से सवाल किए थे?
2021 में स्वास्थ्य विभाग की पदभर्ती परीक्षा में हुआ गोंधळ भी लगातार सवालों में रहा था। उम्मीदवार द्वारा पसंद किए गए परीक्षा केंद्र के बजाय दूसरा केंद्र दिए जाने, परीक्षा शुल्क नहीं भरने वाले उम्मीदवारों को प्रवेशपत्र मिलने और नियोजन के अभाव में स्वास्थ्य विभाग की परीक्षा रद्द करने की नौबत जैसे कई अनसुलझे सवाल उस समय सामने आए थे।
रोहित पवार अब कितने भी आरोप लगाएं, लेकिन महाविकास आघाड़ी के कार्यकाल में ही करीब ढाई लाख परीक्षार्थियों वाली ‘म्हाडा’ की 12 दिसंबर की परीक्षा गैरप्रकार के कारण रद्द की गई थी। उस समय हुई ‘टीईटी’ परीक्षा में गैरप्रकार के जरिए 4.5 करोड़ रुपये के लेन-देन का गंभीर आरोप भी लगाया गया था। इन सभी मामलों की जिम्मेदारी तत्कालीन सरकार के घटक रहे और अब विपक्ष में बैठे नेता लेने को तैयार होंगे या नहीं, यह सवाल बना हुआ है।
इसी बीच 72वें ‘राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह’ के गुजरात के केवडिया स्थित एकतानगर में 22 सितंबर को आयोजित होने की घोषणा के साथ ही इस फैसले को लेकर भी राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आई। मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे ने इस आयोजन को लेकर सवाल उठाते हुए कहा, ‘अब मुंबई के साथ-साथ दिल्ली का महत्व भी खत्म किया जा रहा है।’
राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह अन्य राज्यों में आयोजित होने पर कोई आपत्ति नहीं, लेकिन गुजरात में आयोजन होने के कारण ही इसकी आलोचना क्यों, यह सवाल भी उठाया गया है। दरअसल, ‘राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह’ को केवल राजधानी तक सीमित न रखते हुए इस वर्ष से हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों में आयोजित करने का निर्णय केंद्र सरकार ने लिया है। इस वर्ष सरदार पटेल की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा वाले एकतानगर में होने वाला यह समारोह देशभर के फिल्म क्षेत्र के प्रतिभाशाली कलाकारों को एक मंच पर लाएगा और ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को प्रदर्शित करेगा। इसका अर्थ है कि अब हर वर्ष देश के अलग-अलग राज्यों में इन पुरस्कार समारोहों का आयोजन किया जाएगा।
2011 में यही राज ठाकरे गुजरात के करीब नौ दिन के दौरे पर गए थे। सार्वजनिक मंच से उन्होंने वहां के विकास कार्यों की प्रशंसा करते हुए उन्हें ‘अद्भुत’ और ‘आई ओपनर’ बताया था। सवाल यह भी है कि 2011 के बाद राज ठाकरे ने देश के कितने राज्यों का दौरा कर वहां के विकास कार्यों का जायजा लिया और गुजरात को नौ दिन देने वाले राज ठाकरे ने अन्य राज्यों को कितना समय दिया?
इतना ही नहीं, उन्होंने महाराष्ट्र के नेताओं से गुजरात के विकास को देखने का आह्वान भी किया था और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त उम्मीदवार बताया था। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान राज ठाकरे ने मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए सार्वजनिक समर्थन भी दिया था। ऐसे में सवाल उठता है कि अपनी भूमिका तय करते समय उसे अस्मिता और दूसरों की भूमिका पर मुंबई-दिल्ली को तोड़ने की भाषा से जोड़ने का यह राजनीतिक गणित आखिर क्या है?