किल्लारी भूकंप को 33 साल: 30 सितंबर 1993 की वह काली रात आज भी जिंदा
किल्लारी भूकंप को 33 वर्ष पूरे हो गए। 30 सितंबर 1993 की तड़के आई तबाही ने किल्लारी सहित लातूर और तत्कालीन उस्मानाबाद क्षेत्र में हजारों लोगों की जान ली और कई गांव उजाड़ दिए। इसकी यादें आज भी जिंदा हैं।
तस्वीर में किल्लारी के मलबे के बीच राहत कार्य में जुटे लोग और बिखरे हुए पत्थरों का दृश्य दिखाई दे रहा है।
लातूर: 30 सितंबर 1993 महाराष्ट्र के इतिहास की वह काली रात थी, जब तड़के आए भीषण भूकंप ने किल्लारी सहित लातूर और तत्कालीन उस्मानाबाद क्षेत्र को हिलाकर रख दिया था। कुछ ही क्षणों में कई गांव तबाह हो गए, असंख्य परिवार बेघर हो गए और हजारों निर्दोष नागरिकों की जान चली गई। इस भीषण आपदा को आज 33 वर्ष पूरे हो गए हैं।
भूकंप का झटका कुछ ही क्षणों का था, लेकिन उसकी पीड़ा कई लोगों के जीवन में स्थायी रूप से दर्ज हो गई। भूकंप तड़के आया, इसलिए अधिकांश नागरिक गहरी नींद में थे। अचानक धरती हिली, घरों की छतें और दीवारें ढह गईं और कुछ ही क्षणों में बसे-बसाए परिवार मलबे में बदल गए। किसी ने माता-पिता खो दिए, किसी ने बच्चे, तो किसी ने अपना पूरा परिवार गंवा दिया।
भूकंप के बाद का मंजर आज भी सामूहिक स्मृतियों में दर्ज है। चारों ओर मिट्टी और पत्थरों के ढेर थे। मदद के लिए लोग दौड़ रहे थे, अपनों की तलाश में चीख-पुकार मची थी और अपने लोगों को बचाने के लिए लोग जान की परवाह किए बिना जुटे हुए थे। इस त्रासदी के हर दृश्य ने क्षेत्र की सामूहिक स्मृति पर स्थायी छाप छोड़ी।
इस आपदा में अनेक परिवारों ने केवल अपने घर ही नहीं खोए, बल्कि परिवार के आधार, कमाने वाले पुरुष, माता-पिता, भाई-बहन और छोटे बच्चों को भी हमेशा के लिए खो दिया। कई लोगों के जीवन का सुख एक ही रात में दुख की छाया में बदल गया।
महाभूकंप के बाद शासन, प्रशासन, सामाजिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों और देशभर से आए असंख्य नागरिकों ने राहत और पुनर्वास के लिए प्रयास किए। तबाह हुए गांवों को दोबारा बसाया गया। नई बस्तियां विकसित हुईं, नए घर बनाए गए और धीरे-धीरे जनजीवन सामान्य होने लगा।
समय के साथ किल्लारी क्षेत्र ने फिर से जीवन की ओर कदम बढ़ाया। नई पीढ़ियां बड़ी हुईं और नए सपने देखे गए, लेकिन उस भूकंप की रात को अपनी आंखों से देखने वाली पीढ़ी के मन में उसकी यादें आज भी कायम हैं।
आज 30 सितंबर को उस भयावह रात के 33 वर्ष पूरे हो गए हैं। समय आगे बढ़ा और परिस्थितियां बदलीं, लेकिन भूकंप में जान गंवाने वाले ज्ञात-अज्ञात नागरिकों की स्मृतियां आज भी लोगों के मन में जीवित हैं।
इस काले दिन की स्मृतियों को याद करते हुए किल्लारी भूकंप में जान गंवाने वाले सभी मृतकों को श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है। उनके स्मरण के साथ उस भीषण आपदा से मिले सबक को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाए रखना जरूरी है।
33 वर्ष बीत गए। समय बदला, गांव बदले और पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन 30 सितंबर 1993 की वह रात और अपनों को खोने का दर्द आज भी किल्लारी की मिट्टी, स्मृतियों और असंख्य लोगों के दिलों में जीवित है।