तस्वीर में लाल साड़ी, आभूषणों से सुसज्जित और लकड़ी के पाट पर बैठी हुई कानुमाता की मूर्ति दिखाई दे रही है।

धुले जिले के शिरपुर तालुका स्थित अंतुली गांव में चार वर्ष बाद कानुमाता उत्सव मनाने का सर्वसम्मत निर्णय लिया गया है। शुक्रवार (ता. 7) को ग्रामस्थों की मौजूदगी में हुई बैठक में उत्सव के आयोजन पर सहमति बनी। निर्णय के बाद गांव में उत्साह का माहौल है और बाहरगांव रहने वाले चाकरमानियों में भी उत्सव को लेकर उत्साह बढ़ गया है।

उत्सव के आयोजन को लेकर शुक्रवार को अंतुली के मारुति मंदिर में ग्रामस्थों की बैठक हुई। बैठक में लोकनियुक्त सरपंच आरती ईशी, उपसरपंच जिजाबाई ईशी, इंशेद्र ईशी, धर्मेंद्र ईशी, ग्रामपंचायत सदस्य, प्रतिष्ठित नागरिक और बड़ी संख्या में ग्रामस्थ उपस्थित रहे।

खानदेश में श्रावण महीने का विभिन्न पर्व-उत्सवों के कारण विशेष महत्व है। श्रावण में नागपंचमी के बाद पहले और दूसरे रविवार को कानबाई माता उत्सव के आयोजन की परंपरा है। श्रावण आरंभ होने में कुछ ही दिन शेष हैं और इस वर्ष गांव में कानुमाता उत्सव आयोजित किया जा रहा है। ऐसे में महिला वर्ग ने भी घरों में तैयारियों को गति देना शुरू कर दिया है।

बैठक में सर्वसम्मति से तय कार्यक्रम के अनुसार शनिवार (ता. 15 अगस्त) को सत्यापूजन और रोट दळणे होगा। रविवार (ता. 16) को कानुमाता की स्थापना की जाएगी। इसके बाद सोमवार (ता. 17) को भक्तिमय वातावरण में कानुमाता की गांव से शोभायात्रा निकाली जाएगी और विसर्जन किया जाएगा।

चार वर्ष बाद पारंपरिक कानुमाता उत्सव फिर से आयोजित होने से अंतुली में उत्साह का माहौल है और तैयारियों ने गति पकड़ ली है। महिलाओं और बहनों ने घरों की स्वच्छता, सजावट तथा पारंपरिक तैयारियां शुरू कर दी हैं। वहीं, बाहरगांव रहने वाले चाकरमानी भी उत्सव के लिए गांव लौटने की योजना बना रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में कानुमाता उत्सव को ‘रोट’ के नाम से भी जाना जाता है। यह आयोजन केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और एकता का प्रतीक माना जाता है। परिवारों या भाईबंदकी में वर्षों से चले आ रहे मतभेदों को किनारे रखकर लोग इस अवसर पर एकत्र होते हैं। आपसी दूरी मिटाकर प्रेम, स्नेह और भाईचारा बढ़ाने वाला यह उत्सव ग्रामीण संस्कृति की विशेष पहचान माना जाता है।

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