तस्वीर में पीप्पलेश्वर महादेव मंदिर परिसर में श्रीराम कथा के दौरान आचार्य डॉ. संत दास महाराज माइक के सामने बैठकर प्रवचन देते हुए नजर आ रहे हैं, पीछे धार्मिक चित्रों की पृष्ठभूमि है।

श्रावण मास के अवसर पर रंगबाड़ी रोड स्थित भगवान श्री पीप्पलेश्वर महादेव मंदिर परिसर में चल रही श्रीराम कथा में काशी विश्वनाथ के आचार्य डॉ. संत दास महाराज ने भगवान श्रीराम के जीवन, गुरु की महिमा और भारतीय संस्कृति में मर्यादा के महत्व पर प्रकाश डाला।

डॉ. संत दास महाराज ने कहा कि भगवान श्रीराम वेदस्वरूप हैं। उन्हें विद्यार्थी बनकर गुरुकुल में पढ़ने की आवश्यकता नहीं थी। इसी तरह भागवत पुराण भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात स्वरूप है, फिर भी वे लीला मात्र के लिए गुरुकुल जाते थे।

उन्होंने कहा कि सामान्य विद्यार्थियों में गुरु के प्रति आदर और सम्मान की भावना विकसित हो, इसके लिए भगवान श्रीराम ने शिक्षा ग्रहण करने का मार्ग अपनाया। इससे प्राणीमात्र को यह आभास हो सके कि जानकार होने के बावजूद गुरु की शरण में जाकर ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने चौपाई ‘गुरु बिन भव निधि, तरई न कोई, जो विरंची शंकर सन होई’ की व्याख्या करते हुए कहा कि संत एवं गुरु की शरण के बिना सांसारिक जीवन में सुख-शांति नहीं मिल सकती। भगवान शिव एवं ब्रह्मा भी गुरु पर आश्रित रहे हैं।

उन्होंने कहा कि ‘रामो विग्रहवान धर्मः’ अर्थात भगवान श्रीराम भारत में सनातन धर्म की साक्षात प्रतिमूर्ति हैं। उनके नाम से सभी कार्य लीक से हटकर अलौकिक ही होते हैं।

‘भजिये राम सब काम बिहाई’ का संदेश देते हुए डॉ. संत दास महाराज ने कहा कि सांसारिक जीवन में लाभ-हानि, जीवन-मरण और यश-अपयश सब विधाता के हाथ में है। अच्छे-बुरे कर्म करने से पहले यह जान लेना चाहिए कि प्रारब्ध के कर्मों का फल भोगना ही होगा। व्यस्त दिनचर्या में भी समय निकालकर भगवान को अवश्य याद करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि शांत एवं सुखी रहने के लिए ‘जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है’ का भाव लेकर जीवन जीना चाहिए। जिन पर राम की कृपा होगी, वही इस राम कथा रूपी ज्ञान सरोवर में आते हैं। यह सुख भी सभी को प्राप्त नहीं हो सकता।

किशोर उम्र के विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान राम ने पिता की आज्ञा को सर्वोपरि मानकर मर्यादा स्थापित करने के लिए वन गमन किया था। युवाओं को भारतीय संस्कृति और मर्यादा की जड़ों से जुड़े रहना चाहिए। भीतर से सुदृढ़ होकर बुरी संगत से दूर रहना चाहिए। विद्यार्थी आध्यात्म एवं योग से जुड़कर तनावमुक्त और लक्ष्य केंद्रित बने रह सकते हैं।

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