सत्य वचन ही आत्मकल्याण का मार्ग, मुनि योगसागर जी ने बताया वाणी संयम का महत्व
कोटा के दादाबाड़ी नसियां जी में मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने सत्य अणुव्रत और उसके अतिचारों पर प्रकाश डाला। उन्होंने सत्य के साथ हित, मधुरता और विवेकपूर्ण वाणी को आत्मकल्याण का मार्ग बताया।
तस्वीर में कोटा के दादाबाड़ी नसियां जी में चातुर्मास के दौरान मुनि श्री योगसागर जी महाराज के समक्ष बैठे हुए श्रद्धालु नजर आ रहे हैं।
कोटा, सितम्बर 2026। बुधवार, आश्विन शुक्ल 4 (चतुर्थी) को पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, दादाबाड़ी नसियां जी में चल रहे चातुर्मास के दौरान निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 55 एवं 56 के माध्यम से सत्य अणुव्रत और उसके अतिचारों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य पांच पापों के कारण उस परम पद को प्राप्त नहीं कर पा रहा है। सत्य व्रत का पालन केवल स्वयं झूठ न बोलने तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसी वाणी से भी बचना है, जिससे किसी दूसरे व्यक्ति का पद, सम्मान या प्रतिष्ठा प्रभावित हो।
मुनिश्री ने कहा कि न स्वयं झूठ बोलें, न दूसरों से झूठ बुलवाएं और न ऐसी वाणी का प्रयोग करें, जिससे किसी के प्राणों का घात हो। वाणी ऐसी होनी चाहिए, जो मन को शीतलता प्रदान करे। कटु और असत्य वचन दूसरों के मन को पीड़ा देते हैं और स्वयं के कर्मबंधन का कारण बनते हैं।
उन्होंने कहा कि सत्य बोलना धर्म है, लेकिन सत्य के साथ हित, मधुरता और विवेक का होना भी आवश्यक है। सत्य ऐसा हो, जो किसी के जीवन में प्रकाश लाए, न कि किसी के मन में कटुता और पीड़ा उत्पन्न करे।
मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि एकदेश सत्य अणुव्रत गृहस्थ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अपने स्वार्थ, लोभ अथवा भय के कारण सत्य व्रत में शिथिलता नहीं आनी चाहिए। असत्य के पीछे अनेक बार हिंसा, कपट और परिग्रह जैसी प्रवृत्तियां जुड़ जाती हैं, जिससे आत्मा की शुद्धि का मार्ग बाधित होता है।
उन्होंने कहा कि असत्य केवल शब्दों का दोष नहीं है, बल्कि उसके पीछे छिपे स्वार्थ, छल, भय और लोभ भी आत्मा को कर्मबंधन में बांधते हैं। इसलिए श्रावक को अपनी वाणी और व्यवहार दोनों में सजग रहना चाहिए।
देव, शास्त्र और गुरु की बात को जीवन में उतारकर ही आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। मुनिश्री ने कहा कि केवल भगवान की पूजा करने से नहीं, बल्कि भगवान के बताए मार्ग पर चलने से मनुष्य स्वयं भगवान बनने की दिशा में अग्रसर होता है। जिनवाणी केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए मिली है। यदि विचार, वचन और आचरण में धर्म का प्रभाव दिखाई देने लगे, तभी धार्मिक साधना सार्थक मानी जा सकती है।
मुनि श्री ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार के श्लोक 55-56 के संदर्भ में सत्य व्रत के अतिचारों को समझाते हुए श्रावकों को सावधान किया कि असत्य भाषण, दूसरे से असत्य कहलवाना तथा ऐसी वाणी का प्रयोग करना, जिससे किसी को हानि या पीड़ा पहुंचे, आत्मिक प्रगति में बाधक हैं।
उन्होंने कहा कि वाणी छोटी सी है, लेकिन उसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है। इसलिए बोलने से पहले विचार करना चाहिए कि शब्द किसी के मन को तोड़ेंगे या जोड़ेंगे। ऐसी वाणी बोलनी चाहिए, जिससे सामने वाले के मन में शांति, विश्वास और सद्भाव उत्पन्न हो।
मुनिश्री ने कहा कि सत्य व्रत केवल बोलने की मर्यादा नहीं, बल्कि विचारों की पवित्रता और व्यवहार की सरलता का भी मार्ग है। सत्य के साथ विवेक और करुणा जुड़ जाए तो वाणी स्वयं धर्म का माध्यम बन जाती है।
विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की सपरिवार पूजनकर्ता परिवार द्वारा श्रद्धापूर्वक किए गए। इसमें चातुर्मास कलश स्थापना कर्ता परिवार—श्रीमान महेंद्र कुमार जी, अश्वनी जी, विद्या जी, सार्थक जी, उत्कर्ष जी एवं समस्त धनोप्या परिवार, बसंत विहार शामिल रहे। कलश स्थापना का पुण्यार्जन भी श्रद्धालु परिवार द्वारा किया गया।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमान विनोद कुमार, ऋषभ एवं अभिषेक खटोड़ परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई-अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार द्वारा किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रद्धालुओं द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया। श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ मंजू जी पाटनी को प्राप्त हुआ। श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमान अजित जी, विकास जी एवं प्रीति लुहाड़िया को प्राप्त हुआ।
मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
मुनि श्री योगसागर जी महाराज के संदेश का सार यही रहा कि सत्य व्रत आत्मशुद्धि का मार्ग है। असत्य, कटुता, छल और स्वार्थ से बचते हुए ऐसी वाणी का प्रयोग करना चाहिए, जिसमें सत्य के साथ करुणा, विवेक और हित का भाव हो। वाणी को संयमित करना आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।