कोटा चातुर्मास: योग्य पात्रता, शुद्ध आचरण और वैराग्य से ही आत्मकल्याण संभव: मुनि योगसागर

कोटा के नसियां जी में चातुर्मास प्रवचनमाला के दौरान मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने पात्रता, संयम, तप और वैराग्य को आत्मकल्याण का आधार बताते हुए महत्वपूर्ण संदेश दिए।

Update: 2026-08-01 07:01 GMT

तस्वीर में कोटा के दादाबाड़ी स्थित नसियां जी में मंच पर विराजमान मुनि योगसागर जी महाराज माइक के सामने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

कोटा, 31 जुलाई। श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में आयोजित पावन चातुर्मास प्रवचनमाला के दौरान परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने आत्मकल्याण, पात्रता, संयम और वैराग्य पर आधारित तत्त्वज्ञानपूर्ण प्रवचन देते हुए कहा कि आध्यात्मिक उपलब्धियां केवल इच्छा या प्रयास से नहीं, बल्कि योग्य पात्रता, शुद्ध आचरण, तप, त्याग और वैराग्य से प्राप्त होती हैं। उन्होंने कहा कि सुयोग्य पात्रता, शुद्ध आचरण और वैराग्य से ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

समिति के अनुसार प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मुनिश्री के मंगल प्रवचनों का श्रवण कर धर्मलाभ अर्जित कर रहे हैं। संपूर्ण मंदिर परिसर जिनवाणी, भक्ति, संयम और आत्मचिंतन के वातावरण से गुंजायमान रहा।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने अत्यंत सहज और प्रभावशाली उदाहरण के माध्यम से कहा कि जिस प्रकार प्रत्येक व्यंजन को बनाने के लिए अलग-अलग प्रकार के पात्र और साधनों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आत्मकल्याण और उच्च आध्यात्मिक साधना के लिए भी योग्य पात्रता अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि डोसा विशेष तवे पर ही बन सकता है, सामान्य तवे पर नहीं। ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक उपलब्धियां भी तभी संभव हैं, जब साधक का जीवन शुद्ध, संयमित और दोषरहित हो। केवल इच्छा रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके अनुरूप स्वयं को योग्य बनाना भी आवश्यक है।

मुनिश्री ने कहा कि जब तक शरीर, पर्याय, आचरण, चरित्र और वैराग्य की पवित्रता जीवन में नहीं आती, तब तक आत्मोन्नति का वास्तविक मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि बाहरी अनुशासन के साथ-साथ अंतरंग की निर्मलता भी उतनी ही आवश्यक है। साधना तभी सार्थक होती है, जब जीवन तप, त्याग, संयम और आत्मसंयम से प्रकाशित हो।

अपने ओजस्वी प्रवचन में मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे केवल बाह्य आडंबरों तक सीमित न रहें, बल्कि अपने जीवन को संयम, सदाचार, विनय, वैराग्य और आत्मचिंतन से आलोकित करें। उन्होंने कहा कि आत्मशुद्धि ही आत्मकल्याण का आधार है और आत्मकल्याण ही मोक्षमार्ग का प्रवेशद्वार है। जो साधक अपने भीतर की अशुद्धियों का परिमार्जन करता है, वही जीवन की वास्तविक सफलता प्राप्त करता है।

चातुर्मास प्रवचनमाला के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ पूजन, अर्घ्य समर्पण और जिनवाणी श्रवण कर धर्मलाभ अर्जित किया। मुनिश्री के आध्यात्मिक एवं जीवनोपयोगी संदेशों ने उपस्थित समाजजनों को आत्मचिंतन, आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना के लिए प्रेरित किया।

समिति अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री राजेन्द्र जी, श्री हुकम जैन 'काका', प्रकाश हरसोरा परिवार तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा प्राप्त किया गया। निदेशक हुकम जैन 'काका' ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्रीमती डॉ. संतोष जैन परिवार द्वारा गर्व जैन के 21वें जन्मदिवस के उपलक्ष्य में, श्रीमती सुशीला बाई जी ठोरा परिवार (संधारा वाले) द्वारा पुत्रवधू श्रीमती पदमा जैन के जन्मदिवस के अवसर पर तथा श्री अभिषेक जी एवं आशीष जी के समस्त परिवार द्वारा अभिषेक जी शास्त्री के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।

महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल एवं धर्मचंद धानोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रीमती डॉ. संतोष जैन परिवार एवं लाड़ देवी रावका परिवार द्वारा प्राप्त किया गया। उपाध्यक्ष सुमित जैन एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि मुनिश्री के आहारदान का सौभाग्य राजेंद्र जी, सरिता जी, रोहित जी एवं प्रीतिका जी ठग परिवार को तथा क्षुल्लक श्री संयम सागर जी के आहारदान का सौभाग्य सुधा जी चंबल डेरी परिवार को प्राप्त हुआ। मंगलाचरण का पुण्य अवसर वरुण पोरवाल द्वारा सम्पन्न किया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री की पूजन-अर्चना में अर्घ्य समर्पित कर धर्मलाभ अर्जित किया।

अपने प्रवचन में मुनिश्री ने कहा कि आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए केवल इच्छा नहीं, योग्य पात्रता आवश्यक है। शुद्ध आचरण, तप, त्याग और वैराग्य ही आत्मकल्याण का वास्तविक आधार हैं। संयम और आत्मशुद्धि के बिना साधना पूर्ण नहीं हो सकती। बाहरी अनुशासन के साथ अंतरंग की निर्मलता भी अनिवार्य है। जो स्वयं को योग्य बनाता है, वही आत्मोन्नति और मोक्षमार्ग का अधिकारी बनता है तथा आत्मचिंतन, सदाचार और वैराग्य से ही जीवन सार्थक एवं सफल बनता है।

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