तस्वीर में कोटा के श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी में आयोजित धर्मसभा के दौरान मुनिश्री योगसागर जी महाराज प्रवचन देते हुए और उपस्थित श्रद्धालु नजर आ रहे हैं।

कोटा में निर्यापक श्रमण मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने वैयावृत्त्य और विवेकपूर्ण दान को पुण्यवृद्धि का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए व्रती एवं संयमी जनों की सेवा करने और जरूरतमंद साधर्मी श्रावकों की सहायता करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि दूसरों के कष्ट दूर करने, साधु-संतों की सेवा करने और योग्य पात्र को श्रद्धापूर्वक दान देने से सच्चे वात्सल्य की भावना प्रकट होती है।

28 अक्टूबर 2026 को श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में आयोजित रत्नकरण्डक श्रावकाचार की प्रवचन श्रृंखला में मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने श्लोक क्रमांक 112 एवं 113 की व्याख्या करते हुए वैयावृत्त्य और दान के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि व्रती एवं संयमी जनों की सेवा करना, उनके कष्ट दूर करना तथा जरूरतमंद साधर्मी श्रावकों की सहायता के लिए तन, मन और धन से प्रयास करना प्रत्येक श्रावक का महत्वपूर्ण कर्तव्य है।

मुनिश्री ने वैयावृत्त्य का अर्थ समझाते हुए बताया कि सम्यग्दर्शन आदि गुणों के प्रति प्रीति रखते हुए व्रतधारी एवं संयमी साधु-संतों पर आने वाली विभिन्न प्रकार की विपत्तियों को दूर करना वैयावृत्त्य कहलाता है। उनके शारीरिक कष्टों का निवारण करना, आवश्यकतानुसार सेवा करना और गुरु की आज्ञा का पालन करना भी इसी भावना का हिस्सा है। इस संदर्भ में उन्होंने मुनि विष्णुकुमार द्वारा सात सौ मुनियों की रक्षा के लिए अपनी ऋद्धि का उपयोग कर संकट दूर करने का प्रसंग सुनाया और सेवा, करुणा तथा धर्मनिष्ठा की प्रेरणा दी।

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि समाज में परस्पर सहयोग और वात्सल्य की भावना आवश्यक है। एकल परिवारों की संख्या बढ़ने के साथ व्यक्ति का ध्यान दूसरों के बजाय स्वयं तक सीमित होता जा रहा है। वात्सल्य के स्थान पर स्वार्थ की प्रवृत्ति बढ़ना सामाजिक समरसता के लिए उचित नहीं है। प्रत्येक श्रावक को दूसरे श्रावक का पूरक बनना चाहिए और किसी साधर्मी पर संकट आने पर उसकी सहायता के लिए आगे आना चाहिए। दूसरों के दुख दूर करने का प्रयास ही सच्चे वात्सल्य और वैयावृत्त्य की पहचान है।

प्रवचन के दौरान श्लोक क्रमांक 113 की व्याख्या करते हुए मुनिश्री ने दान का लक्षण बताया। उन्होंने कहा कि सम्यग्दर्शन आदि गुणों से युक्त पात्र मुनिराज को शारीरिक शुद्धि और उचित विधि का ध्यान रखते हुए नवधा भक्तिपूर्वक आहार देना दान कहलाता है। इसके साथ ही साधु-संतों के लिए औषधि, शास्त्र और निवास संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करना भी दान के अंतर्गत आता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि दान केवल वस्तु देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें श्रद्धा, शुद्ध भावना, पात्र की पहचान और विवेक भी आवश्यक हैं। उत्तम, मध्यम और जघन्य पात्र का विचार करते हुए योग्य पात्र को उचित समय पर आवश्यकतानुसार दिया गया सहयोग ही दान की सार्थकता को प्रकट करता है। दान और सेवा का उद्देश्य आत्मकल्याण के साथ-साथ पुण्यबंध तथा कर्मनिर्जरा की भावना को पुष्ट करना होना चाहिए।

मुनिश्री ने श्रावकों को अपने जीवन में संयम, सेवा, परोपकार और विवेकपूर्ण व्यवहार अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि धार्मिक क्रियाएं तभी सार्थक होती हैं, जब सदाचार और संयम भी जीवन में उतरें। दूसरों के कष्ट दूर करने, साधु-संतों की सेवा करने और योग्य पात्र को श्रद्धापूर्वक दान देने से समाज में प्रेम, सहयोग और समरसता का वातावरण निर्मित होता है।

श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ प्राप्त करने वाले परिवारों के नाम तथा कलश स्थापना के पुण्यार्जक परिवार का विवरण प्राप्त होना शेष है।

श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमान राजेन्द्र, हुकम काका प्रकाश हरसोरा परिवार; श्रीमान पारस, श्रीमती नेहा एवं अनादी सिलोरिया परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार ने प्राप्त किया।

भक्तामर विधान में भी श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक भाग लेकर पुण्यार्जन किया। श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ चंद प्रकाश जी एवं भुवनेश जी धनोप्या परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं, मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य अनीता जैन हरसोरा (कमल साउंड) को मिला।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किए और जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया। प्रवचन में सेवा के माध्यम से वात्सल्य, दान में विवेक और जीवन में संयम अपनाने पर जोर दिया गया। मुनिश्री के अनुसार, वैयावृत्त्य व्रत साधु-संतों और जरूरतमंद साधर्मी बंधुओं की सहायता की प्रेरणा देता है, जबकि विवेकपूर्ण दान का महत्व वस्तु की मात्रा के बजाय श्रद्धा, पात्र की पहचान, उचित विधि और निष्काम भावना में निहित है।

सेवा के संदर्भ में स्वास्थ्य का ध्यान रखने का संदेश भी दिया गया। अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए अस्वस्थ, वृद्ध अथवा जरूरतमंद व्यक्तियों की सहायता उनकी आवश्यकताओं और परिस्थितियों को समझकर करने की बात कही गई। संतुलित दिनचर्या, संवेदनशीलता और सहयोग की भावना को स्वस्थ समाज के निर्माण में सहायक बताया गया।

धर्मसाधना के संदेश में साधु-संतों की विनयपूर्वक सेवा करने, संकटग्रस्त साधर्मी की सहायता के लिए आगे आने और योग्य पात्र को विवेकपूर्वक दान देने की प्रेरणा दी गई। दूसरों के दुख दूर करने का भाव ही सच्चे वात्सल्य और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।

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