गुरु के बताए मार्ग पर चलना ही सच्ची गुरुभक्ति: मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज का आत्मकल्याण संदेश
कोटा के श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में चातुर्मास धर्मसभा के दौरान निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने गुरु महिमा, साधु स्वरूप और आत्मकल्याण पर विस्तृत प्रवचन दिया। जानिए उन्होंने सच्चे गुरु और गुरुभक्ति का क्या महत्व बताया।
तस्वीर में कोटा के नसियां जी में आयोजित चातुर्मास के दौरान श्रद्धालु और गणमान्य व्यक्ति एक धार्मिक अनुष्ठान के अवसर पर नजर आ रहे हैं।
कोटा, 4 अगस्त। श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में परम पूज्य ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ससंघ के पावन चातुर्मास के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा में गुरु महिमा, साधु स्वरूप और आत्मकल्याण के दिव्य रहस्यों पर आधारित प्रवचन ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। मुनिश्री ने कहा कि सच्चे गुरु केवल मार्गदर्शक नहीं, बल्कि साधक के जीवन को आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर करने वाली दिव्य प्रेरक शक्ति हैं। उन्होंने कहा कि गुरु का सान्निध्य जीवन को धर्म, संयम और मोक्षमार्ग की ओर मोड़ देता है।
मुख्य संयोजक चातुर्मास 2026 श्री हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि प्रतिदिन आयोजित धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होकर मुनिश्री के जीवनोपयोगी एवं तत्वज्ञानमय प्रवचनों का लाभ ले रहे हैं।
धर्मसभा में मुनिश्री ने आचार्य समन्तभद्र स्वामी द्वारा रचित ग्रंथराज रत्नकरण्डक श्रावकाचार के आधार पर सच्चे गुरु के स्वरूप का सरल और प्रभावशाली विवेचन किया। उन्होंने कहा कि गुरु के प्रति श्रद्धा केवल वंदना या शब्दों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनके बताए मार्ग को अपने जीवन में उतारना ही वास्तविक गुरुभक्ति है।
मुनिश्री ने अपने परम पूज्य गुरु आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के संस्मरण साझा करते हुए कहा कि संघ में रहते हुए वे गुरु महाराज के प्रत्येक वचन को पत्थर की लकीर और दिव्य आशीर्वाद मानकर श्रद्धापूर्वक आत्मसात करते थे। उन्होंने कहा कि गुरु की प्रत्येक आज्ञा को जीवन का सौभाग्य मानकर उसका पालन करना ही सच्चे शिष्य का धर्म है।
प्रवचन के दौरान मुनिश्री ने भावलिंगी साधु और द्रव्यलिंगी साधु के स्वरूप का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि साधु का केवल बाह्य स्वरूप ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि उसके अंतर्मन की निर्मलता, वैराग्य, संयम और आत्मभाव की शुद्धता भी उतनी ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि निर्ग्रंथ दिगम्बर साधु, जो केशलोंच करते हैं तथा पीछी एवं कमंडलु धारण कर वीतराग साधना में निरंतर लीन रहते हैं, वे पूजनीय हैं। सच्चे गुरु की पहचान उनके त्याग, तप, आचरण, आत्मानुशासन और आत्मकल्याण की प्रेरणा से होती है।
मुनिश्री ने कहा कि जो श्रद्धालु जिनेंद्र भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा रखते हुए उनकी आप्तवाणी के अनुरूप अपना जीवन ढालता है, वही वास्तविक अर्थों में आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर होता है। उन्होंने कहा कि गुरु, देव और शास्त्र के प्रति समर्पित श्रद्धा तभी सार्थक है, जब वह जीवन में सदाचार, संयम, त्याग और आत्मचिंतन के रूप में दिखाई दे। केवल सुनना पर्याप्त नहीं, बल्कि धर्म को व्यवहार में उतारना ही मोक्षमार्ग की पहली सीढ़ी है।
धर्मसभा में बाहर से पधारे अतिविशिष्ट श्रद्धालु श्री विकेश मेहता (बांसवाड़ा), श्री महावीर जी मा0, श्री विमल जी (नांता), श्री विनोद ठोरड़ी, श्री जे.के. जैन, श्री नरेश वेद, श्री पारस झाझारी और श्री नरेन्द्र खुराना ने परम पूज्य मुनिश्री के श्रीचरणों में श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद चातुर्मास स्वागत समिति की ओर से सभी अतिथियों का आत्मीय स्वागत और अभिनंदन किया गया।
चातुर्मास प्रवचनमाला के अंतर्गत श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पूजन, अर्घ्य समर्पण, जिनवाणी वंदना और धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया। पूरा मंदिर परिसर णमोकार महामंत्र, गुरुभक्ति और जिनवाणी के मंगलमय स्वर से गुंजायमान रहा।
मुख्य संयोजक चातुर्मास 2026 श्री हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री हुकमचंद–कमलेश–हितेश–कपिल सोगानी परिवार, श्रीमती विमला जी–श्री मुकेश जी मीना बरमूंडा परिवार (मीना जी के स्वास्थ्य लाभ हेतु), श्री राजेश–श्रीमती सोनम सेठिया परिवार (पिताश्री दीपचंद जी सेठिया की पुण्य स्मृति में) तथा श्रीमती सुशीला जी विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।
उन्होंने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्रीमती सुशीला बाई, प्रभात, संतोष, पदमा, प्रीति, प्रमिला, प्राची, अक्षिता एवं समस्त ठोरा परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।
धर्मचंद धनोपिया ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री राजेश–श्रीमती सोनम सेठिया परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।
उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि मुनिश्री के आहारदान का सौभाग्य श्री लोकेश–श्रीमती सारिका पाटोदी परिवार को तथा क्षुल्लक श्री संयम सागर जी के आहारदान का सौभाग्य जम्बू, ओमप्रकाश एवं भानु आवां परिवार को प्राप्त हुआ। मंगलाचरण का पुण्य अवसर आशा पल्लिवाल द्वारा सम्पन्न किया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धाभावपूर्वक आचार्यश्री की पूजन-अर्चना एवं अर्घ्य समर्पित कर धर्मलाभ अर्जित किया।
मुनिश्री ने अपने संदेश में कहा कि सच्चे गुरु जीवन को आत्मकल्याण की दिशा देने वाले दिव्य प्रेरक हैं। गुरु के बताए मार्ग पर चलना ही वास्तविक गुरुभक्ति है। गुरु के प्रति श्रद्धा तभी सार्थक है, जब उनके उपदेश जीवन में उतरें। उन्होंने कहा कि बाह्य साधुता के साथ आंतरिक पवित्रता और भावशुद्धि भी अनिवार्य है तथा जिनेंद्र भगवान की आप्तवाणी के अनुरूप जीवन जीने वाला ही मोक्षमार्ग का सच्चा साधक बनता है। उनके अनुसार गुरु, देव और शास्त्र के प्रति अटूट श्रद्धा आत्मा को वीतरागता, आत्मबोध और मोक्ष की ओर अग्रसर करती है।