तस्वीर में राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे उदयपुर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान मंच से संबोधित करते हुए नजर आ रहे हैं।

उदयपुर में आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह में राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे ने कहा कि सम्पूर्ण जगत में प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा पर शोध और अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विश्व में भारत की ज्ञान परम्परा आज भी अक्षुण्ण रही है।

राज्यपाल श्री बागडे रविवार को उदयपुर में इतिहास विभाग, फैकल्टी ऑफ सोशल साइंस एंड ह्यूमेनिटीज, पेसिफिक अकादमी ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च विश्वविद्यालय, वैश्विक संस्कृत मंच एवं वैश्विक इतिहास मंच के तत्वावधान में आयोजित ‘प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा : ज्ञान एवं विज्ञान के आधुनिक आयाम’ विषय पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे।

राज्यपाल श्री बागडे ने कहा कि विदेशी दार्शनिकों, भाषाविदों और लेखकों ने भी भारतीय ज्ञान परम्परा, भौतिक क्षमता, समृद्ध भाषा, वैश्विक दर्शन और परमाणुवाद के महत्व को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के आगमन से पहले भारतीय ज्ञान परम्परा के संवर्धन और विकास के लिए भारत में आठ लाख गुरुकुल, विद्यालय और आश्रम संचालित थे।

उन्होंने कहा कि इन संस्थानों को पतन के कगार पर पहुंचाकर लॉर्ड मैकाले ने भारतीय संस्कृति, ज्ञान और विज्ञान पर आघात किया, जो भारत में अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के रूप में दृष्टव्य है। इससे यहां के लघु कुटीर उद्योगों का भी पतन हुआ।

अपने उद्बोधन में राज्यपाल ने बप्पा रावल द्वारा विदेशी आक्रमणकारियों को भारत भूमि से बाहर निकालने से संबंधित विविध उद्धरण प्रस्तुत किए। साथ ही उन्होंने रावलपिंडी नाम की सार्थकता को भी बप्पा रावल के नाम से जोड़कर प्रस्तुत किया।

राज्यपाल के संबोधन में प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा, उसके वैश्विक प्रभाव और उसके संवर्धन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर जोर दिया गया। अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह में उन्होंने प्राचीन भारतीय ज्ञान और विज्ञान के आधुनिक आयामों पर शोध एवं अध्ययन की आवश्यकता को प्रमुखता से रेखांकित किया।

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