जयपुर में रोठ तीज पर दिगंबर जैन समाज ने रखी व्रत-संयम की नींव
शुद्आचार्यों ने रोठ तीज पर शुद्ध भावना और सदाचार का संदेश दिया, श्रद्धालुओं ने जिनालयों में पूजा-अर्चना कर संयम का संकल्प लिया।
जयपुर। दिगम्बर जैन परंपरा में भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला रोठ तीज पर्व रविवार को श्रद्धा, भक्ति, व्रत, संयम, त्याग और आत्मशुद्धि की भावना के साथ मनाया गया। जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं ने नित्य-नियम, पूजन, जिनभक्ति और धार्मिक आराधना करते हुए व्रत की महत्ता को समझा तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार संयम और सदाचार अपनाने का संकल्प लिया। इस अवसर पर जैन मंदिरों में श्रद्धालुओं की भक्ति देखने को मिली।
आचार्य नवीननंदी महाराज ने रोठ तीज व्रत की महत्ता बताते हुए श्रद्धा और संयम के महत्व पर प्रकाश डाला। प्रवचनों में कहा गया कि व्रत की निंदा नहीं, बल्कि श्रद्धा से उसका पालन मनुष्य को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाता है। कर्मों के उदय के अनुसार जीवन में परिस्थितियां बदलती रहती हैं। ऐसे में मनुष्य को सुख-दुःख से ऊपर उठकर अपने कर्मों और आचरण के प्रति सजग रहना चाहिए।
आचार्य विशद सागर महाराज ने कहा कि रोठ केवल व्यंजन नहीं, बल्कि श्रद्धा और भावना का प्रतीक है। जैन परंपरा में रोठ अर्थात मोटी मीठी रोटी को श्रद्धा एवं भक्ति का प्रतीक माना जाता है। गेहूं के आटे, घी, बुरे आदि से तैयार किया जाने वाला रोठ इस पर्व की धार्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ है। इसकी विशेषता इसके आकार या वैभव में नहीं, बल्कि बनाने वाले की भावना, श्रद्धा और संयम में मानी जाती है।
रोठ तीज से जुड़ी धार्मिक कथा में भगवान महावीर के समवशरण और राजा श्रेणिक के प्रसंग का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार उज्जैनी के सेठ सागरदत्त के परिवार की एक महिला ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद श्रद्धापूर्वक अपनी सामर्थ्य के अनुसार रोठ तैयार किया। उसकी दृढ़ श्रद्धा और पुण्य के प्रभाव से सामान्य प्रतीत होने वाला रोठ अत्यंत मूल्यवान हो गया और परिवार के जीवन में पुनः सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त हुआ।
इस कथा का संदेश बाहरी चमत्कार से अधिक श्रद्धा, कर्म और भावना की शक्ति को समझना है। व्यक्ति के पास साधन कम हों, लेकिन उसके भीतर धर्म के प्रति सच्ची आस्था, त्याग और संयम हो तो वही उसके जीवन की वास्तविक संपदा बन सकती है।
गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने कहा कि रोठ तीज केवल एक धार्मिक परंपरा निभाने का अवसर नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को अपने जीवन, आचरण और कर्मों पर आत्मचिंतन करने की प्रेरणा देता है। जैन दर्शन में व्रत एवं संयम को आत्मशुद्धि और कर्मनिर्जरा का महत्वपूर्ण साधन माना गया है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य जन्म मिलना दुर्लभ है और उससे भी दुर्लभ है धर्म, व्रत एवं संयम को जीवन में धारण करने का अवसर। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार अहिंसा, सत्य, संयम, त्याग, सदाचार और परिग्रह से विरक्ति जैसे जीवन-मूल्यों को अपनाने का प्रयास करना चाहिए।
धार्मिक मान्यता के अनुसार व्रत-संयम की साधना व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठाकर आत्मकल्याण की दिशा में ले जाती है। यही साधना क्रमशः कर्मों की निर्जरा और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होने का माध्यम बनती है।
अखिल भारतीय दिगंबर जैन युवा एकता संघ अध्यक्ष अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि रोठ तीज यह भी सिखाती है कि धर्म में धन-दौलत अथवा बाहरी प्रदर्शन से अधिक महत्व शुद्ध भावना और आचरण का है। व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार धर्माराधना करे, व्रत रखे, जिनपूजन करे, जरूरतमंदों के प्रति करुणा रखे और अपने व्यवहार में संयम एवं सदाचार लाए, यही इस पर्व की सार्थकता है।
जैन श्रावक और श्राविकाओं ने रविवार को रोठ तैयार कर जिनालय में अर्पित करने, साधु-साध्वियों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने तथा परिवार एवं समाज के साथ धार्मिक भावनाएं साझा करने की परंपरा निभाई। इन परंपराओं का उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि त्याग, संयम और आत्मचिंतन की भावना को जीवन में उतारना है।
अभिषेक जैन बिट्टू के अनुसार रोठ तीज का वास्तविक संदेश यही है कि जीवन में सुख-संपदा से अधिक मूल्यवान शुद्ध भावना है, बाहरी वैभव से अधिक महत्वपूर्ण संयम है और संसार की उपलब्धियों से बढ़कर आत्मकल्याण है। जैन श्रद्धालुओं ने इस पावन अवसर पर श्रद्धा-भक्ति के साथ जिनेन्द्र भगवान की आराधना करते हुए संयम, त्याग, सदाचार और आत्मशुद्धि को जीवन का हिस्सा बनाने का संकल्प लिया।