'वंदे मातरम' विवाद पर कंगना रनौत और शर्मिला टैगोर आमने-सामने, बयान से गरमाई बहस|
वंदे मातरम के छंदों पर शर्मिला टैगोर की टिप्पणी के बाद कंगना रनौत ने उन पर पलटवार करते हुए हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर आने की नसीहत दी है।
वंदे मातरम विवाद के संदर्भ में अभिनेत्री कंगना रनौत और शर्मिला टैगोर दिखाई दे रही हैं।
देश में 'वंदे मातरम' के शुरुआती छंदों को लेकर शुरू हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है, और अब इस पर अभिनेत्री कंगना रनौत और वरिष्ठ अभिनेत्री शर्मिला टैगोर आमने-सामने आ गईं हैं। हाल ही में वेटरन एक्ट्रेस शर्मिला टैगोर ने 'वंदे मातरम' को लेकर अपनी राय रखते हुए एक बयान दिया था, जिसके बाद राजनीतिक गलियारों और फिल्म इंडस्ट्री में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। शर्मिला टैगोर ने एक साक्षात्कार के दौरान कहा था कि 'वंदे मातरम' के केवल शुरुआती दो छंद ही अच्छे हैं और इसके बाकी के छंद गाना उन लोगों के लिए मुश्किल हो सकता है जो केवल एक ही ईश्वर में विश्वास रखते हैं। उन्होंने तर्क दिया था कि गीत के कुछ छंदों में कई देवी-देवताओं का जिक्र है, जैसे 'वंदे काली, वंदे दुर्गा', जिसे एक ईश्वर को मानने वाले लोगों के लिए गाना थोड़ा असहज कर सकता है। उनके इस बयान के सामने आते ही इस पर प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया।
इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अभिनेत्री कंगना रनौत ने शर्मिला टैगोर के बयान पर गहरी हैरानी जताई है। कंगना ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी के माध्यम से शर्मिला टैगोर के इस रुख की आलोचना की और कहा कि एक वरिष्ठ कलाकार होने के नाते कला और कविता को लेकर उनकी सोच इतनी सीमित और बनावटी कैसे हो सकती है। कंगना ने आगे कहा कि कविता या गीतों में इस्तेमाल किए गए शब्द केवल रूपक होते हैं और कवि अपनी रचनाओं में मनचाहा प्रभाव पैदा करने के लिए विभिन्न प्रकार की कल्पनाओं और प्रतीकों का सहारा लेते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि 'वंदे मातरम' केवल एक गीत नहीं, बल्कि देश की आजादी की लड़ाई की एक ऐतिहासिक भावना है, जिसके जरिए बंकिम चंद्र चट्टোপাধ্যায় ने देशवासियों के भीतर की सोई हुई शक्ति को जागृत करने का काम किया था। कंगना ने स्वामी विवेकानंद के प्रसिद्ध विचारों का हवाला देते हुए कहा कि जब महान विचारकों ने लोहे जैसे शरीर और फौलाद जैसी हड्डियों की बात की थी, तो वे किसी मौसम का हाल नहीं बता रहे थे, बल्कि वे देश के युवाओं में आगे बढ़ने और संघर्ष करने की शक्ति का आह्वान कर रहे थे।
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कंगना रनौत ने शर्मिला टैगोर को संबोधित करते हुए लिखा कि उन्हें इस प्रकार की सीमित हिंदू-मुस्लिम वाली सोच से पूरी तरह बाहर निकलना चाहिए, भले ही लोग एक ही ईश्वर में विश्वास क्यों न रखते हों। हालांकि, अपने इस कड़े बयान के अंत में कंगना ने स्नेह भी जताया और कहा कि वह शर्मिला टैगोर से बहुत प्रेम करती हैं और हमेशा की तरह उनसे गर्मजोशी के साथ मिलना पसंद करेंगी।
यह पूरा विवाद मूल रूप से 15 अगस्त के आसपास तब गरमाया था जब स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान राजनीतिक दलों के बीच इसे लेकर आरोप-प्रत्यारोप शुरू हुए थे। भारतीय जनता पार्टी ने यह आरोप लगाया था कि कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जब यह राष्ट्रीय गीत गाया जा रहा था, तब इसे पूरा गाने से रोकने का प्रयास किया गया। इस राजनीतिक और वैचारिक बहस के बीच जब शर्मिला टैगोर ने अपने विचार रखे, तो मामला और अधिक तूल पकड़ गया। इस प्रकार, 'वंदे मातरम' के छंदों और उसकी प्रासंगिकता को लेकर छिड़ी इस नई बहस ने एक बार फिर देश में सांस्कृतिक और वैचारिक तर्कों को सामने ला दिया है, जहां विभिन्न पक्षों की ओर से लगातार अपनी-अपनी दलीलें पेश की जा रही हैं।