पर्युषण के ‘ध्यान दिवस’ पर अर्जुन मेड़तवाल ने बताया आत्म विशुद्धि का अनमोल उपक्रम
डोंबिवली में पर्युषण के ध्यान दिवस पर अर्जुन मेड़तवाल और गेहरीलाल बाफना ने ध्यान, प्रेक्षाध्यान और आत्मविशुद्धि का महत्त्व समझाया।
तस्वीर में मंच पर बैठे दो वक्ता और पीछे 'ध्यान दिवस' का बैनर दिख रहा है।
पर्वाधिराज पर्युषण के सप्तम दिवस को केन्द्रीय निर्देशानुसार ‘ध्यान दिवस’ के रूप में मनाया गया। मुंबई के डोंबिवली में महातपस्वी आचार्य महाश्रमण की आज्ञा से समागत उपासक द्वय अर्जुन मेड़तवाल और गेहरीलाल बाफना के निर्देशन में पर्युषण की सम्यक् आराधना गतिमान है। इस अवसर पर विशाल श्रावक-श्राविका समुदाय को ध्यान के आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्त्व से अवगत कराया गया।
प्रेरक उद्बोधन में प्रवक्ता उपासक अर्जुन मेड़तवाल ने कहा कि आध्यात्मिकता के क्षेत्र में ध्यान का बहुत बड़ा महत्त्व है। वर्तमान जीवन भौतिकता प्रधान है और इसमें अनेक प्रकार की कठिनाइयां आती हैं। पग-पग पर व्यक्ति को संघर्ष झेलने पड़ते हैं, जिससे तनाव का बढ़ना स्वाभाविक है।
उन्होंने कहा कि कैंसर, हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर आदि अनेक बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इनके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन तनाव भी एक महत्त्वपूर्ण कारण है। व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ पारिवारिक, व्यावसायिक और सामाजिक जीवन में भी तनाव की समस्या उत्पन्न होती है। तनाव की इस समस्या के निवारण के लिए ध्यान का प्रयोग सबसे कारगर उपाय हो सकता है।
अर्जुन मेड़तवाल ने कहा कि वर्तमान में ध्यान की अनेक प्रविधियां प्रचलन में हैं, लेकिन उनमें सबसे उपयोगी और प्रभावी प्रविधि प्रेक्षाध्यान है। उन्होंने बताया कि प्रेक्षाध्यान आचार्य श्री महाप्रज्ञजी की 20 वर्ष की सघन साधना और खोज की निष्पत्ति है। प्रेक्षाध्यान के प्रयोगों से शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सुस्वास्थ्य प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने ध्यान के संदर्भ में स्वरचित मुक्तकों की प्रस्तुति भी दी, जिससे उपस्थित जनसमुदाय प्रभावित हुआ।
सहयोगी उपासक गेहरीलाल बाफना ने कहा कि ध्यान एक साधना है और इसकी नियमित रूप से साधना करनी चाहिए। इस साधना से अनेक समस्याओं का समाधान मिल सकता है। उन्होंने कहा कि ध्यान वैसे कभी भी किया जा सकता है, लेकिन प्रातःकाल में एक निश्चित स्थान चुनकर, सही समय और सही आसन लगाकर नियमित ध्यान के प्रयोग करने से जीवन में निरामयता और निर्विकारता की उपलब्धि हो सकती है। इसके बाद निर्विचारता की स्थिति में पहुंचने से परम शांति की उपलब्धि हो सकती है।
तेरापंथी सभा डोंबिवली के अध्यक्ष मदन कोठारी ने आगामी कार्यक्रमों की महत्त्वपूर्ण जानकारी दी। पर्युषण के सप्तम दिवस पर हुए आयोजन में ध्यान को आत्मविशुद्धि, मानसिक संतुलन और परम शांति की दिशा में साधना के रूप में रेखांकित किया गया।