तस्वीर में चित्तौड़गढ़ रामद्वारा में आयोजित कथा के दौरान मंच पर प्रवचन देते हुए संत दिग्विजय राम नजर आ रहे हैं।

तीनों लोक में भगवत नाम के आश्रय की महिमा बहुत बड़ी है। स्वयं भगवान महादेव को भी राम का नाम प्रिय है। महादेव की कृपा हो जाए तो जीवन धन्य हो जाता है और सात जन्मों की दरिद्रता समाप्त हो जाती है। यह बात संत दिग्विजय राम महाराज ने चित्तौड़गढ़ रामद्वारा में चातुर्मासिक सत्संग के तहत आयोजित महाशिव पुराण कथा में कही।

कथा में संत दिग्विजय राम महाराज ने माता पार्वती और भगवान महादेव के बीच हुए संवाद का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि माता पार्वती को हजारों वर्षों तक तपस्या करते देखकर उनकी परीक्षा लेने के लिए भगवान महादेव वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर उनके पास पहुंचे। ब्राह्मण के रूप में उन्होंने भगवान महादेव की निंदा करते हुए माता पार्वती को विचलित करने का प्रयास किया।



उन्होंने कहा कि तुम दुर्लभ वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा रख रही हो। तुम्हें कोई दूसरा वर प्राप्त कर लेना चाहिए। महादेव ऐसे वर हैं, जो अमंगल वेष धारण करते हैं, भस्म लगाकर रखते हैं और कपाल धारण करते हैं। ऐसे वर को प्राप्त करके क्या करोगी। उनके जन्म का भी आज तक किसी को पता नहीं है और वे भूत-प्रेतों के साथ रहने वाले हैं। तुम तो स्वर्ण की मुद्रा देकर काठ लेने जैसा काम कर रही हो।

ब्राह्मण से महादेव की निंदा सुनकर माता पार्वती ने कहा कि तुम्हें शिव तत्व की जानकारी नहीं है, इसलिए ऐसी बातें कर रहे हो। तुमने उनके वास्तविक रूप को नहीं जाना है। वे निर्गुण होकर भी माया से भिन्न हैं। महादेव सभी विद्याओं के अधिष्ठाता हैं और लोक तथा परलोक की भक्ति प्रदान करने वाले हैं। महादेव निर्विकार हैं। सगुण और निर्गुण दोनों में शिव हैं।

माता पार्वती ने भगवान महादेव का गुणानुवाद करते हुए अपनी सखी विद्या से कहा कि शिव निंदा करने और सुनने वाला पाप का भागी होता है। इसलिए उन्होंने अन्यत्र जाकर तपस्या करने का विचार किया। इसी दौरान ब्राह्मण के रूप में आए भगवान महादेव प्रकट हुए और माता पार्वती को विवाह का वचन दिया।

संत दिग्विजय राम महाराज ने कहा कि भगवान कभी भी भक्त से दूर नहीं रहते, लेकिन भक्ति विकार रहित और सच्चे मन से होनी चाहिए। सभी शास्त्रों में भगवत नाम के आश्रय की महिमा बताई गई है। जो भी अपने जीवन में भगवत नाम का आश्रय ले लेता है, उसका लोक और परलोक दोनों सुधर जाता है।

Tags: