बस्सी की काष्ट कला पर शोध के लिए पहुंचा अमेरिकी दल, डॉक्यूमेंट्री से दुनियाभर में चमकी पहचान
बस्सी की प्रसिद्ध काष्ट कला पर शोध करने के लिए अमेरिका की मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी का दल पांच दिन तक चित्तौड़गढ़ के बस्सी में रहा। इस दल ने डॉक्यूमेंट्री के जरिए कावड़ निर्माण की बारीकियों को दुनिया के सामने पेश किया है।
तस्वीर में बस्सी के कलाकार सत्यनारायण सुथार अमेरिकी शोधार्थी को लकड़ी की कावड़ बनाने और उस पर पेंटिंग करने का प्रशिक्षण देते हुए दिख रहे हैं।
चित्तौड़गढ़ जिले के बस्सी क्षेत्र की काष्ट कला की ख्याति अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गई है। इसी कला को करीब से जानने और उस पर शोध करने के लिए मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी अमेरिका का एक दल पांच दिनों तक बस्सी में रुका। सेन्ट्रल फॉर इन्टिग्रेटिव स्टडीज इन सोशल साइंस, मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी द्वारा 'कल्चरल स्टडीज विद परपज' के तहत इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म का निर्माण किया गया, जिसका उदयपुर में प्रदर्शन किया गया। यह अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक पहल भारतीय शिल्प संस्थान और समर्थ एक्सचेंज प्रोग्राम के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई। इस कार्यक्रम के जरिए भारत और अमेरिका के विद्यार्थियों ने देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और सामाजिक जीवन का अध्ययन किया।
भारतीय शिल्प संस्थान के शोधार्थी हर्ष कमल ने बताया कि बस्सी की कावड़ पर अमेरिका के टेलर क्विलनिनल शोध कर रहे हैं, जिन्होंने पांच दिनों तक बस्सी में रहकर लकड़ी से कावड़ बनाने और उस पर पेंटिंग का कार्य सीखा। इस अध्ययन यात्रा में मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के साथ जेके लक्ष्मीपत विश्वविद्यालय जयपुर और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्राफ्ट एंड डिजाइन जयपुर के विद्यार्थियों ने भी भाग लिया। इन प्रतिभागियों ने उदयपुर और आसपास के क्षेत्रों में पारंपरिक शिल्प और लोक संस्कृति का बारीकी से अध्ययन किया।
बस्सी के राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त कलाकार सत्यनारायण सुथार ने दल को काष्ट कला की सूक्ष्म बारीकियां सिखाईं, जिसके बाद छात्रों ने स्वयं भी कावड़ का निर्माण किया। सत्यनारायण सुथार ने बताया कि डॉक्यूमेंट्री में कावड़ सहित विभिन्न विषयों को समाहित किया गया है। आगामी 25 जुलाई से जयपुर में होने वाले कार्यक्रम में भी इसे शामिल किया जाएगा। इस पूरे प्रोग्राम का नेतृत्व डॉ. एडी वाउचर, स्टीफन मित्रा लिंडाहल, चंचल राठौड़ और गरिमा चौधरी ने किया। साथ ही, अमेरिकी दल ने बस्सी क्षेत्र के प्राकृतिक स्थलों का भी दौरा किया।
कावड़ को मुगल काल का टेलीविजन माना जाता है, जो लकड़ी के मंदिर के रूप में निर्मित होती है। इसमें दरवाजों की तरह पट्ट बनाए जाते हैं, जिन पर कहानी के अनुसार चित्रों की सीरीज उकेरी जाती है। बस्सी में मांग के अनुरूप 4 से 5 फीट तक की कावड़ तैयार की जाती है, जो कहानी के माध्यम से कला प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करती है।