छत्रपति संभाजीनगर में नाबालिग बच्ची के संरक्षण मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने बच्ची के कल्याण को सर्वोपरि मानते हुए पिता के पक्ष में फैसला सुनाया।   

छत्रपति संभाजीनगर में मां के निधन के बाद नाना के पास रह रही नाबालिग बच्ची के संरक्षण को लेकर मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने नाना की अपील खारिज करते हुए बच्ची को 15 दिनों के भीतर उसके पिता के सुपुर्द करने का आदेश दिया। साथ ही बच्ची और नाना के बीच संबंध बनाए रखने के लिए हर रविवार चार घंटे मुलाकात की अनुमति भी दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्ची के कल्याण को सर्वोच्च महत्व देते हुए उसके संरक्षण पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति संदीप कुमार सी. मोरे और न्यायमूर्ति वैशाली पाटील-जाधव की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान नाबालिग के संरक्षण से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर विचार किया। अदालत ने नाना की अपील खारिज करते हुए निर्देश दिया कि बच्ची को 15 दिनों के भीतर पिता के सुपुर्द किया जाए। इसके साथ ही नाना को प्रत्येक रविवार दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक बच्ची से मिलने की अनुमति दी गई, ताकि दोनों के बीच संबंध बने रहें।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6 और संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 की धारा 17 के प्रावधानों पर विचार किया। पीठ ने कहा कि बच्ची के कल्याण को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए। मां के निधन के बाद कुछ समय तक बच्ची का नाना के पास रहना मात्र प्राकृतिक संरक्षक पिता के अधिकार को समाप्त नहीं करता। अदालत ने बच्ची के हितों को ध्यान में रखते हुए उसके संरक्षण के संबंध में निर्णय लिया।

जानकारी के अनुसार, विवाह के बाद दंपति के यहां बेटी का जन्म हुआ था। जन्म के कुछ ही दिनों बाद हृदयाघात से मां का निधन हो गया। अंतिम संस्कार और अन्य धार्मिक विधियां पूरी होने तक पिता ससुराल में ही रहे। इसके बाद उन्होंने बेटी को अपने साथ ले जाने की इच्छा जताई। हालांकि, ससुराल पक्ष के आग्रह पर पिता ने बच्ची को कुछ समय तक वहीं रहने दिया।

बाद में जब बच्ची को पिता के सुपुर्द करने से इनकार कर दिया गया, तो उन्होंने जालना परिवार न्यायालय में याचिका दायर की। मामले की सुनवाई के बाद परिवार न्यायालय ने 30 जून 2025 को बच्ची को 60 दिनों के भीतर पिता के संरक्षण में सौंपने का आदेश दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए नाना ने मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ में अपील दायर की।

हाईकोर्ट ने नाना की अपील खारिज करते हुए परिवार न्यायालय के फैसले के अनुरूप बच्ची को पिता के सुपुर्द करने का निर्देश दिया, हालांकि इसके लिए 60 दिनों के बजाय 15 दिनों की समय-सीमा तय की गई। अदालत ने नाना को प्रत्येक रविवार दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक बच्ची से मिलने की अनुमति देकर उनके साथ संबंध बनाए रखने का भी प्रावधान किया।

मामले में नाना की ओर से अधिवक्ता भूषण वी. विर्घ ने पक्ष रखा, जबकि पिता की ओर से अधिवक्ता किरण डी. जाधव और वी. एल. भंगे ने पैरवी की। हाईकोर्ट के इस फैसले में नाबालिग के कल्याण, प्राकृतिक संरक्षक के अधिकार और परिवार के सदस्यों के साथ संबंध बनाए रखने से जुड़े पहलुओं को ध्यान में रखते हुए बच्ची के संरक्षण का निर्णय दिया गया।

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