तस्वीर में मंच पर विराजमान जैन मुनि के सामने धार्मिक परिधान में श्रद्धालु खड़े दिखाई दे रहे हैं।

भीलवाड़ा, 21 सितम्बर। भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में सोमवार को दशलक्षण (पर्युषण) महापर्व के छठे दिन सुगन्ध दशमी पर उत्तम संयम धर्म की श्रद्धा एवं भक्ति भाव से आराधना की गई। श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में आयोजित कार्यक्रम में भगवान का अभिषेक करने के दौरान श्रावक-श्राविकाएं भक्ति में झूम उठे और जमकर नाचते-गाते रहे।

आचार्य पुलकसागर महाराज ने उत्तम संयम धर्म का संदेश देते हुए कहा कि आलस्य और बहानेबाजी संयम की पालना में सबसे बड़े बाधक हैं। इरादे रोज बनते और टूट जाते हैं। मन चंचल होने से संयम के भाव को टिकने नहीं देता। धर्म और संयम के मार्ग में बंधन बहुत हैं, लेकिन ये बंधन मुक्ति का मार्ग हैं। मात्र मनुष्य गति ही ऐसा अवसर है, जब संयम धर्म की पालना हो सकती है।

आचार्य पुलकसागर महाराज ने जैन तीर्थों की पवित्रता बचाने का आह्वान करते हुए कहा कि तीर्थों पर शिकायत लिखने वाला धर्मात्मा नहीं हो सकता। तीर्थों पर संयम पालना की जगह विषय भोग कर उन्हें अपवित्र मत बनाओ। तीर्थयात्रा को मौजमस्ती की यात्रा मत बनाओ। पहले तीर्थयात्रा संयम की साधना हुआ करती थी, लेकिन अब मनोरंजन का साधन बन गई है। जब से तीर्थों पर सुविधाएं जुटाई जाने लगी हैं, तभी से वहां विधर्मियों के कब्जे होने लगे हैं और तीर्थ हम अपने हाथ से खो रहे हैं।

उन्होंने अफसोस जताया कि आज हमारी रसोई भी पवित्र नहीं रह गई है। हमारा धर्म दिखावे, मनोरंजन और विषय भोग का होता जा रहा है। हम महाव्रती नहीं बन सकते तो जीवन में अणुव्रत की पालना तो करें। बिना नियम लिए दुनिया से नहीं जाएं। परमात्मा की साधना करते हुए जीवन छोड़ने का भाव रखें। नियम टूटने के डर से नियम लेना नहीं छोड़ें।

आचार्यश्री ने कहा कि बिना नियम कुछ भी करेंगे तो कोई फल नहीं मिलने वाला है। धर्म गुरु द्वारा दिए बंधन मुक्ति का मार्ग बन जाते हैं। आज संयम व त्याग हमारे धर्म से छूटता जा रहा है। छना हुआ पानी पीना और रात्रि भोजन त्यागी जैसी पहचान हम खोते जा रहे हैं। रात्रि विवाह और रात्रि भोज के बाद अब पारणा भोज की परम्परा भी आ गई है। तप की अनुमोदना किसी के घर भोज खाने से नहीं, तपस्वी की सेवा करके और उसके जैसा संकल्पी बनने के भाव से होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि आंख, नाक, जुबान, शरीर और कान इन पांच को वश में कर लो, जीवन में शांति हो जाएगी और आनंद आएगा। दर्पण में चेहरा नहीं, चारित्र देखने का प्रयास करें। पर्युषण हमारे जीवन में बदलाव का माध्यम होना चाहिए। परिग्रह बढ़ाकर उत्तम संयम की पालना नहीं हो सकती है।

श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि पर्युषण में आयोजित पाप नाशनम् शिविर में शामिल सैकड़ों श्रद्धालु प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक परमात्मा की पूजा-अर्चना व भक्ति में समर्पित हैं। पर्युषण के छठे दिन चक्रवर्ती बनकर भगवान का अभिषेक करने का सौभाग्य शिरीष, मंजू जैन इंदौर ने प्राप्त किया। शांतिधारा का सौभाग्य उम्मेदमल, प्रेमलता गंगवाल चित्तौड़गढ़ ने प्राप्त किया। सायंकालीन महाआरती का सौभाग्य अंजना, प्रदीप इशिका चौधरी ने प्राप्त किया।

दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन मंगलवार को उत्तम तप धर्म की आराधना होगी। चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह एवं सह संयोजक लोकेश अजमेरा के अनुसार पाप नाशनम शिविर एवं पर्युषण की दस दिवसीय आराधना अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर 25 सितम्बर को पूर्ण होगी।

इस दौरान प्रतिदिन सुबह 5.30 से 6.30 बजे तक योग ध्यान एवं आचार्य भक्ति हो रही है। सुबह 7 बजे से भगवान का अभिषेक, शांतिधारा व दशलक्षण धर्म पूजन हो रहा है। सुबह 9.15 से 10.15 बजे तक आचार्य पुलकसागर महाराज के प्रवचन हो रहे हैं। शाम 4 बजे से धार्मिक कक्षाएं हो रही हैं। शाम 5.30 से 6.30 बजे तक प्रतिक्रमण एवं ध्यान साधना का आयोजन होता है। शाम को 6.30 बजे आरती के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम के माध्यम से परमात्मा की भक्ति हो रही है।

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