तस्वीर में गुलाबी वस्त्र पहने आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज भक्तों को प्रवचन दे रहे हैं।

संसार से मुक्ति पाने का एकमात्र माध्यम राम का नाम है और राम की साधना ही मुक्ति के द्वार खोलती है। संसार न कभी हमारा था, न है और न रहेगा, जबकि राम कल भी हमारे थे, आज भी हैं और कल भी रहेंगे। दुनिया और नजर बदलती रहेगी, लेकिन अपरिवर्तनीय रहेगा तो वह राम का नाम और उसकी महिमा है। ये विचार अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाघीश्वर जगतगुरू आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत मंगलवार को माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में आयोजित दैनिक सत्संग में व्यक्त किए।

आचार्यश्री ने कहा कि जिसको राम प्रिय है, उसका जीवन आदर्श हो सकता है। व्यक्ति तन से जितना दुःखी नहीं है, उससे अधिक मन से दुःखी है। मानसिक विकृतियां परिवार, समाज और राष्ट्र को तबाह कर देती हैं। मानसिक विकृति वाले व्यक्ति का उपचार राम नाम से ही होता है और यह उपचार संत और सद्गुरू ही कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि भजन के बिना जीवन सार्थक नहीं हो सकता। जिसके जीवन में भजन नहीं है, वह विनाश की तरफ है और जिसके जीवन में भजन का आधार है, उसका चहुंमुखी विकास होता है। महापुरूषों ने भजन के माध्यम से मानसिक साधना की है। साधना में मन की एकाग्रता आवश्यक है। जिसके मस्तक पर राम विराजमान हैं, उसे किसी अन्य की आवश्यकता नहीं रहती।

आचार्यश्री ने कहा कि हमारी राष्ट्रीय एवं सामाजिक एकता नारंगी की तरह नहीं, बल्कि खरबूजे की तरह होनी चाहिए। नारंगी ऊपर से एक होती है, लेकिन अंदर अनेक फांके होती हैं, जबकि खरबूजे पर ऊपर अलग-अलग धारियां होती हैं, पर अंदर एक होता है। वर्तमान में हर दल और हर समाज में बिखराव की स्थिति है। एकता के अभाव में नुकसान हो रहा है। सभी राजनीतिक दल एक होकर देशभक्ति का परिचय दें तो भारत से आतंकवाद समाप्त होकर रहेगा। अंदर की फूट देश को कमजोर करती है।

आचार्य रामदयाल महाराज ने कहा कि जिसकी व्यथा और दुःख चला जाए तथा जो राग-द्वेष या हर्ष-विषाद नहीं करता, वही परमात्मा का प्रिय होता है। ऐसा भक्त कोई आकांक्षा नहीं रखता। जो प्रिय को पाकर प्रसन्न और अप्रिय को पाकर दुःखी नहीं होता, वही भगवान का सच्चा भक्त होता है। भक्त न किसी की निंदा करता है, न किसी की स्तुति, वह न किसी को अच्छा कहता है और न किसी को बुरा।


 


उन्होंने कहा कि जीवन के सभी सारों का सार राम का नाम है। राम जड़-चेतन सहित जगत के कण-कण में व्याप्त हैं। हमारे जिन कर्मों से जगत घृणा करता है, उन्हें समाप्त करने का सामर्थ्य राम नाम में है। राम नाम पढ़ लिया तो जगत में सब पढ़ लिया।

आचार्यश्री ने कहा कि जब तक हमारी पूर्ति न हो जाए, संसार, गुरू और परमात्मा से सम्बन्ध रखते हैं। परमार्थ भाव से परमात्मा को चाहने वाले अंगुली पर गिनने लायक हैं। माता-पिता से हम संपत्ति की चाह तो रखते हैं, लेकिन उनकी सेवा नहीं करना चाहते। महाभारत में अर्जुन को श्रीकृष्ण कहते हैं कि भगवान को वही प्रिय होता है, जिसकी कोई अपेक्षा नहीं होती।

आचार्यश्री से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन किया। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। सूर्यास्त के समय संध्या आरती और रामस्नेही सम्प्रदाय के युवा संत रामजस ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

आचार्य रामदयालजी महाराज ने बताया कि रामद्वारा में ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत विश्व शांति एवं कल्याण की भावना से 13 से 20 सितम्बर तक विराट श्रीमद् भागवत ज्ञान सप्ताह का आयोजन होगा। इसके लिए व्यापक स्तर पर तैयारियां की जा रही हैं। इसमें भागवत भक्ति, भक्त व भगवान पर चर्चा और जीवन दर्शन पर प्रवचन होंगे।

इस दौरान 108 भागवत मूल पाठ का ऐतिहासिक आयोजन भी होगा। पुष्कर से आने वाले 108 वेदपाठी विद्वान पंडित भागवत का मूल पाठ करेंगे। इन 108 भागवत का पूजन 108 यजमान परिवार करेंगे। सप्ताह के दौरान प्रतिदिन सुबह 8.30 से 10.30 बजे तक एवं दोपहर 2 से 4 बजे तक श्रीमद् भागवत कथा तथा सुबह 10.30 बजे से 11.30 बजे तक एवं शाम को 4 से 5 बजे तक श्रीवाणीजी का प्रवचन होगा। श्रीवाणीजी का प्रवचन आचार्य श्री रामदयालजी महाराज के मुखारबिंद से होगा। श्रीमद् भागवत कथा का वाचन संत मनोरथराम रामजी राम मचलाना द्वारा किया जाएगा।

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