आचार्य पुलकसागर महाराज: अच्छा दिखने के बजाय अच्छा बनने पर जोर
भीलवाड़ा में चातुर्मास के दौरान आचार्य पुलकसागर ने कहा कि पुण्य छिपाकर और पाप दिखाकर करना चाहिए। घर में सुख-शांति के लिए 'ना नहीं बोलूंगा' सूत्र अपनाएं।
भीलवाड़ा में चातुर्मास प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं को धर्म संदेश देते आचार्य पुलकसागर।
भीलवाड़ा में आचार्य पुलकसागर महाराज ने जीवन को बेहतर बनाने के लिए पुण्य और पाप के प्रति दृष्टिकोण बदलने का संदेश देते हुए कहा कि अच्छा दिखने के बजाय अच्छा बनने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पुण्य छिपाकर और पाप दिखाकर करना चाहिए, क्योंकि पाप को जितना अधिक दिखाएंगे, उससे उतनी ही जल्दी पीछा छूटेगा। घर-परिवार में सुख-शांति बनाए रखने के लिए उन्होंने ‘ना नहीं बोलूंगा’ का सूत्र अपनाने की सीख भी दी।
श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने सोमवार को शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में अंतिम चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला ‘जीवन जीने की कला’ के छठे दिन मंगल दिव्य देशना दी। उन्होंने कहा कि संसार में अच्छा बनने वालों की तुलना में खुद को अच्छा दिखाने वालों की भीड़ अधिक है। हमारा पूरा जीवन अच्छा दिखने में बीत जाता है, जबकि अच्छा दिखना बाहरी और अच्छा बनना आंतरिक बदलाव है। आत्मा के कल्याण के लिए वीतरागी और धर्मात्मा दिखने के बजाय वैसा बनने की जरूरत है।
आचार्यश्री ने कहा कि हम पाप छिपाकर और पुण्य छपाकर करते हैं, जबकि जीवन को अच्छा बनाना है तो पुण्य छिपाकर और पाप दिखाकर करना चाहिए। पाप को जितना अधिक दिखाया जाएगा, उससे उतनी ही जल्दी पीछा छूटेगा।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति की पहली बार में बनी छवि लाख प्रयास करने के बाद भी बदलना मुश्किल होता है। यदि पहली बार में किसी की छवि अच्छी बन गई तो कोई उसकी निंदा या चुगली करेगा, तब भी सुनने वाला विश्वास नहीं करेगा और यही कहेगा कि वह ऐसा नहीं कर सकता। इसके विपरीत, यदि किसी की छवि बुरी बन गई तो उसके अच्छा कार्य करने पर भी लोग भरोसा नहीं करेंगे।
आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि जिससे राग हो जाता है, उसके दोष दिखाई नहीं देते और जिससे राग नहीं होता, उसकी अच्छाई में भी बुराई नजर आने लगती है। जीवन में हमारे शब्दों से पहले हमारी भावनाएं सामने वाले तक पहुंचती हैं। छूने से छूने वाले की नीयत और देखने से देखने वाले की नीयत का पता चल जाता है। रिश्ते भावनाओं के बजाय शब्दों के आधार पर चलने से रूखे हो रहे हैं। यदि भावनाएं निर्मल नहीं होंगी तो अपने लोग भी पास नहीं आना चाहेंगे। अच्छे लोग न तो किसी की बुराई करते हैं और न ही बुराई सुनते हैं।
उन्होंने कहा कि घर में रिश्तों को स्नेहभाव से जीवित रखना है तो एक सूत्र अपना लें—‘ना नहीं बोलूंगा।’ कोई आपकी कमी निकाले तो भी हां बोल दें, इससे घर में सुख-शांति बनी रहेगी। जैसे ही ना बोलना शुरू करेंगे, बहस शुरू हो जाएगी, कषाय बढ़ेंगे और अशांति व कलह पैदा होगी। हां बोलते ही सामने वाले के कषाय कमजोर हो जाएंगे और जीवन में सुकून मिलेगा।
आचार्यश्री ने कहा कि कषायों से बचने का प्रयास करने वाले ही साधक होते हैं। कषाय और द्वेष भाव से जितना बचेंगे, जीवन उतना ही खुशहाल बनेगा। जीवन रूपी सांप-सीढ़ी में हर पंक्ति में सांप मिलेंगे तो उन्हें मारने के बजाय उनसे बचकर निकलना चाहिए। ऐसा करने से जीवन में सफलता मिलेगी। उन्होंने कहा कि हां कहने से बात आगे नहीं बढ़ती, बल्कि समाधान की राह खुलती है।
श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि प्रवचन के प्रारंभ में पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति को प्राप्त हुआ। कार्यक्रम का संचालन चातुर्मास समिति के महामंत्री जयकुमार पाटनी ने किया।
चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह एवं सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने बताया कि 30 अक्टूबर तक प्रतिदिन सुबह 8.45 से 10 बजे तक आचार्यश्री के मुखारबिंद से दिव्य देशना प्राप्त होगी। इसके साथ ही प्रतिदिन शाम 6.30 से 7.30 बजे तक आनंद यात्रा (प्रश्न मंच) का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर लाभ प्राप्त कर रहे हैं।