शेरगढ़ दुर्ग में विरासत यात्रा और सावन की गोठ, इतिहास-पुरातत्व पर मंथन
बारां के शेरगढ़ दुर्ग में विरासत यात्रा, इतिहास-पुरातत्व सेमिनार और सावन की गोठ हुई। इतिहासकारों ने धरोहर संरक्षण पर मंथन किया।
तस्वीर में शेरगढ़ दुर्ग परिसर में आयोजित सेमिनार के दौरान माइक से संबोधित करते हुए अतिथि और मंच पर बैठे गणमान्य सदस्य दिखाई दे रहे हैं।
भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक धरोहर न्यास (INTACH-वराह नगरी बारां अध्याय) के तत्वावधान में रविवार, 23 अगस्त 2026 को शेरगढ़ दुर्ग परिसर में एक दिवसीय “विरासत यात्रा, सेमिनार एवं सावन की गोठ” का आयोजन हुआ। कार्यक्रम में इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, साहित्यकारों, पत्रकारों, इतिहास प्रेमियों और जिले के गणमान्य नागरिकों ने भाग लिया। इस दौरान शेरगढ़ के इतिहास, पुरातत्व और स्थापत्य महत्व पर चर्चा के साथ ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण का संकल्प लिया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत सुबह 9 बजे बारां के झालावाड़ रोड स्थित श्री रामजानकी मंदिर से शेरगढ़ के लिए आयोजित विरासत यात्रा से हुई। इसमें बारां के प्रबुद्ध नागरिकों, इतिहास प्रेमियों, समाजसेवियों और इंटेक सदस्यों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। शेरगढ़ पहुंचने पर सुबह 11:15 बजे दुर्ग परिसर में “शेरगढ़: इतिहास और पुरातत्व” विषय पर सेमिनार आयोजित किया गया।
सेमिनार के मुख्य अतिथि इंटेक एडवाइजरी कमेटी के चेयरमैन एवं वरिष्ठ उद्योगपति श्री विष्णु कुमार साबू ने कहा कि हाड़ौती और विशेषकर बारां जिले का इतिहास अत्यंत समृद्ध और वैभवशाली रहा है। परवन नदी के तट पर स्थित शेरगढ़ दुर्ग केवल पत्थरों की संरचना नहीं, बल्कि सदियों पुरानी संस्कृति, वास्तुकला और सामरिक शक्ति का जीवंत प्रमाण है। उन्होंने कहा कि इस अमूल्य धरोहर को पर्यटन के अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर स्थापित करना और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना सभी का नैतिक दायित्व है। उद्योग जगत और सामाजिक संगठनों को मिलकर विरासत संरक्षण के क्षेत्र में आगे आना होगा।
सेमिनार की अध्यक्षता प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता एवं इंटेक सदस्य श्री प्रशांत पाटनी ने की। उन्होंने कहा कि विरासतें पूर्वजों का दिया हुआ अनमोल उपहार हैं। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इतिहास और संस्कृति के प्रति जन-जागरूकता फैलाना आवश्यक है। स्थानीय समुदाय और समाज जब तक ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति सजग नहीं होगा, तब तक इनका वास्तविक संरक्षण संभव नहीं है। उन्होंने इंटेक द्वारा आयोजित विरासत यात्रा और सावन की गोठ को सांस्कृतिक समरसता तथा ऐतिहासिक चेतना का संगम बताया।
वरिष्ठ इतिहासकार एवं पुरातत्वविद् राकेश कुमार शर्मा ने मुख्य वक्ता के रूप में पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से शेरगढ़ के ऐतिहासिक, पुरातात्विक और स्थापत्य महत्व पर शोधपरक व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि शेरगढ़, जिसे प्राचीन काल में कोषवर्धन कहा जाता था, का इतिहास सदियों पुराना है। यहां मिले गुप्तकालीन और पूर्व-मध्यकालीन शिलालेख, जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं, प्राचीन मंदिर, बौद्ध गुफाएं और जल-दुर्ग का अद्वितीय स्वरूप इसे पुरातत्व के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान प्रदान करते हैं। शेरशाह सूरी के समय इसका नाम शेरगढ़ पड़ा, लेकिन इसके प्राचीन पुरातात्विक अवशेष बताते हैं कि यह क्षेत्र सनातन, बौद्ध और जैन धर्म-संस्कृति का प्रमुख केंद्र रहा है। उन्होंने शेरगढ़ में व्यापक पुरातात्विक शोध और उत्खनन की अपार संभावनाएं बताईं।
विशिष्ट अतिथि एवं एडवाइजरी कमेटी सदस्य श्री ओमप्रकाश शर्मा ने कहा कि शेरगढ़ का हर एक पत्थर इतिहास की एक अनकही कहानी कहता है। क्षेत्र के प्राचीन मंदिरों, शिलाखंडों और महलों की शिल्पकला को सुरक्षित रखना समय की बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने दस्तावेजीकरण के माध्यम से इस इतिहास को संजोने की आवश्यकता बताई, ताकि भविष्य की पीढ़ियां अपने गौरवशाली अतीत पर गर्व कर सकें।
विशिष्ट अतिथि श्री कुंजबिहारी नागर ने कहा कि ऐसी विरासत यात्राएं लोगों को इतिहास के साथ-साथ प्रकृति और संस्कृति के प्रति सम्मान से भी जोड़ती हैं। शेरगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता और परवन नदी का विहंगम दृश्य पर्यटकों को आकर्षित करने की पूरी क्षमता रखता है।
अन्य विशिष्ट अतिथि डॉ. देवीशंकर नागर, अध्यक्ष, लायंस क्लब बारां श्री जी ने कहा कि सामाजिक संस्थाओं और क्लबों को भी सांस्कृतिक विरासतों के संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभानी चाहिए। लायंस क्लब बारां श्री जी ऐसे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अभियानों में इंटेक के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग करने के लिए सदैव तत्पर है।
कार्यक्रम के अंत में इंटेक बारां चैप्टर के संयोजक जितेन्द्र कुमार शर्मा ने सभी अतिथियों एवं आगंतुकों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इंटेक बारां चैप्टर का मुख्य उद्देश्य जिले की उपेक्षित और विस्मृत हो रही सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक धरोहरों को मुख्यधारा में लाना और उनका संरक्षण सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि यह आयोजन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि ऐतिहासिक धरोहरों को पुनर्जीवित करने का सतत प्रयास है। बारां जिले के अन्य ऐतिहासिक स्थलों अटरू, विलासगढ़, काकूनी और रामगढ़ के संरक्षण के लिए भी ऐसे जन-जागरूकता कार्यक्रम निरंतर आयोजित किए जाएंगे।
सेमिनार के बाद दोपहर 1 बजे इतिहासकार राकेश कुमार शर्मा के निर्देशन में अतिथियों एवं सदस्यों ने शेरगढ़ दुर्ग, प्राचीन बावड़ियों, जैन प्रतिमाओं, सोमनाथ मंदिर, श्री कल्याणराय जी की हवेली, पालकियां हवेली, लक्ष्मी नारायण मंदिर, झाला हवेली और जैन मंदिर परिसरों के साथ परवन नदी के तट का विस्तृत पुरातात्विक भ्रमण किया। इस दौरान दुर्ग की वास्तुकला की बारीकियों को समझा गया।
इसके बाद दोपहर 2:30 बजे प्रकृति की गोद में पारंपरिक ‘सावन की गोठ’ आयोजित हुई। इसमें सदस्यों और अतिथियों ने हाड़ौती के पारंपरिक व्यंजन दाल-बाटी-चूरमा का आनंद लिया और आपसी सांस्कृतिक विचार-विमर्श किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यकार, पत्रकार, इतिहास प्रेमी और जिले के गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।
कार्यक्रम के अंत में इतिहासकार राकेश शर्मा तथा इंटेक सदस्य नरेंद्र सिंह सोलंकी और आदित्य पांडे के नेतृत्व में शेरगढ़ की विभिन्न ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक संरचनाओं का गहन अवलोकन किया गया। इनमें आवासीय किला, बरखेड़ी दरवाजा, सन 790 का नागवंशी सामन्त देवदत्त का शिलालेख, तोपखाना, चतुर्भुज मंदिर, गोपालरायजी का मंदिर, एक खम्भा मंदिर, लक्ष्मीनाथ मंदिर, परमारकालीन शिलालेख, नाव दरवाजा, झाला हवेली, रामशिला, हनुमान मंदिर, वल्लभ सम्प्रदाय की षष्ठपीठ की निर्माणाधीन कल्याणरायजी की हवेली, जैन मंदिर, जैन त्रिमूर्ति मंदिर एवं छतरी, तमिल रामानुजकोट का प्राचीन मंदिर एवं छतरी, प्राचीन खंडहर हवेलियां, पिछला किला गेट, सैन्य किला गेट, बावड़ी, बुर्ज, प्राचीन बावड़ी, किलेदार का आवास, नदी का सुरक्षा बुर्ज, व्यू प्वाइंट, जलापूर्ति ढाना एवं नहर, चारभुजानाथ मंदिर, बैरक, घुड़साल, बारूदखाना आदि भवन, प्राचीन तोप, बाहरी सुरक्षा दीवार, चौकियां, बुर्ज, तोप ऊपर चढ़ाने के रैम्प, बाहर जैन चरणचौकी, मनसा माता मंदिर, सैन्य किले का पिछला गुप्त दरवाजा, किले की 300 फीट ऊंची चट्टानी सुरक्षा और ऊपर की दीवार शामिल रही।
विरासत यात्रा, शोधपरक सेमिनार और पुरातात्विक भ्रमण के माध्यम से शेरगढ़ की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत को समझने तथा उसके संरक्षण के लिए जन-जागरूकता को आगे बढ़ाने का संदेश दिया गया।