भारत में कितने विदेशियों को मिली फांसी; जानिए कानूनी पहलू
विदेशी जेलों में सजा काट रहे भारतीय नागरिकों की कहानियां अक्सर चर्चा में रहती हैं। हाल ही में केरल की रहने वाली निमिषा प्रिया यमन में फांसी की सजा पाए जाने के बाद सुर्खियों में आईं। उनकी फांसी भारत सरकार की मध्यस्थता के चलते टाल दी गई है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत में अब तक केवल एक विदेशी नागरिक को ही फांसी की सजा दी गई है, और वह नाम है—अजमल आमिर कसाब।
26/11 का खौफनाक हमला :
26 नवंबर 2008, भारत के इतिहास का सबसे काला दिन। पाकिस्तान से आए 10 लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी समुद्र के रास्ते मुंबई में दाखिल हुए और 60 घंटे तक खौफनाक हिंसा का खेल खेला। 166 निर्दोष लोगों की मौत हुई, सैकड़ों घायल हुए। इन आतंकियों में से 9 को मौके पर ही मार गिराया गया, लेकिन एक आतंकी—अजमल कसाब—जिंदा पकड़ा गया। यह वही आतंकी था जिसकी ताज होटल, छत्रपति शिवाजी टर्मिनस और अन्य जगहों पर अंधाधुंध गोलीबारी की तस्वीरें पूरी दुनिया ने देखीं।
मुकदमा और सजा :
अजमल कसाब पर 2009 में मुकदमा शुरू हुआ। उस पर हत्या, देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने और आतंक फैलाने समेत 80 से ज्यादा गंभीर धाराएं लगाई गईं। 2010 में मुंबई की विशेष अदालत ने कसाब को फांसी की सजा सुनाई, जिसे बॉम्बे हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उसकी दया याचिका खारिज कर दी, और इसके बाद उसकी फांसी की प्रक्रिया शुरू की गई।
गोपनीय ऑपरेशन :
21 नवंबर 2012 की सुबह पुणे की यरवदा जेल में कसाब को फांसी दी गई। पूरी प्रक्रिया इतनी गुप्त रखी गई थी कि सिर्फ कुछ ही लोग जानते थे कि उसे कब और कहां फांसी दी जानी है। सुरक्षा कारणों से उसके शव को यरवदा जेल परिसर में ही दफना दिया गया, क्योंकि पुणे के किसी कब्रिस्तान ने उसे दफनाने की अनुमति नहीं दी। पाकिस्तान को आधिकारिक रूप से सूचना दी गई, लेकिन उसने कसाब का शव लेने से इनकार कर दिया।
कसाब की पहचान और पाकिस्तानी कनेक्शन :
कसाब पाकिस्तान के फरीदकोट गांव का रहने वाला था। लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर जकी-उर-रहमान लखवी ने हमले में शामिल होने के बदले उसके परिवार को 1.5 लाख रुपये देने की बात कही थी। हमले के बाद कसाब के खिलाफ मिले सबूत इतने पुख्ता थे कि वह आजाद भारत में फांसी पर चढ़ने वाला पहला विदेशी नागरिक बना।
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भारतीय कानून का क्या कहना है ?
भारतीय कानून में फांसी की सजा का प्रावधान केवल “रेयर ऑफ रेयरेस्ट” मामलों में होता है। अपराधी चाहे भारतीय हो या विदेशी, न्यायपालिका के लिए अपराध और सबूत ही मायने रखते हैं। कसाब के मामले में अदालत ने कहा कि उसका अपराध इतना जघन्य और अमानवीय था कि समाज की न्याय व्यवस्था के लिए उसे फांसी देना जरूरी था।
निमिषा प्रिया और अन्य भारतीय नागरिक आज भी विदेशों में फांसी की सजा का सामना कर रहे हैं, लेकिन भारत में अब तक केवल अजमल कसाब ही वह विदेशी है जिसे फांसी पर लटकाया गया। 26/11 हमले की बरसी हर साल हमें उस आतंकी हमले के घाव याद दिलाती है और कसाब की फांसी इस बात का प्रतीक है कि भारतीय न्याय व्यवस्था ऐसे अपराधों पर कितना कठोर रुख अपनाती है।
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