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लैंड फॉर जॉब घोटाला में लालू को झटका; SC ने ठुकराई याचिका
By EditorialPublished on
'लैंड फॉर जॉब' घोटाले में लालू यादव को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं! लालू ने दलील दी थी कि एफआईआर 14 साल की देरी से दर्ज हुई और मामले में पहले ही प्राथमिक जांच बंद हो चुकी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा—केस रद्द करने की मांग हाई कोर्ट में रखें।

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राजद सुप्रीमो और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को ‘लैंड फॉर जॉब’ मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। लालू ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर इस केस की निचली अदालत में चल रही सुनवाई पर रोक लगाने की मांग की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि उनकी याचिका पहले से ही दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित है और उन्हें वहीं अपनी दलील रखनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी :
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा—“हम सिर्फ इतना कह सकते हैं कि हाई कोर्ट आपकी याचिका का जल्द निपटारा करे और अंतिम फैसले में पहले की गई टिप्पणियों पर ध्यान न दे।” साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने लालू यादव को निचली अदालत में व्यक्तिगत पेशी से छूट देने की मंजूरी दी।
दिल्ली हाई कोर्ट में क्या स्थिति ?
29 मई को दिल्ली हाई कोर्ट ने लालू यादव की उस अर्जी को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने मुकदमे पर रोक लगाने की मांग की थी। हालांकि, कोर्ट ने एफआईआर को रद्द करने की उनकी याचिका पर सीबीआई को नोटिस जारी किया था। इसका मतलब है कि लालू की याचिका अब भी हाई कोर्ट में लंबित है।
क्या है ‘लैंड फॉर जॉब’ घोटाला ?
यह मामला रेलवे के पश्चिम मध्य जोन में ग्रुप डी नौकरियों में भर्ती के दौरान कथित घोटाले से जुड़ा है। आरोप है कि 2004 से 2009 के बीच रेल मंत्री रहते हुए लालू प्रसाद यादव ने नौकरी दिलाने के बदले जमीनें लीं और इन्हें अपने परिवार और करीबी सहयोगियों के नाम पर ट्रांसफर कराया। इस सिलसिले में मई 2022 में सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें लालू, उनकी पत्नी राबड़ी देवी और परिवार के अन्य सदस्यों के नाम शामिल हैं।
सीबीआई ने इस मामले में 2022, 2023 और 2024 में तीन चार्जशीट दाखिल की हैं। लालू इन चार्जशीट और एफआईआर को रद्द कराने की मांग कर रहे हैं।
लालू की दलीलें :
लालू यादव का कहना है कि एफआईआर 14 साल की देरी से दर्ज की गई है। इससे पहले मामले की प्राथमिक जांच बंद कर दी गई थी। उन्होंने यह भी दलील दी कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 17A के तहत किसी अधिकारी के खिलाफ केस दर्ज करने से पहले संबंधित प्राधिकरण से अनुमति जरूरी होती है, लेकिन इस नियम का पालन नहीं किया गया।
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सीबीआई का जवाब :
सीबीआई का पक्ष रख रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने कहा कि लालू का मामला भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 17A के दायरे में नहीं आता। इसलिए अनुमति लेने का सवाल ही नहीं उठता।
आगे की कानूनी राह :
अब लालू यादव की नजर दिल्ली हाई कोर्ट पर टिकी है, जहां एफआईआर रद्द करने की उनकी याचिका और चार्जशीट को चुनौती देने वाली अर्जी लंबित है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह इस स्तर पर हस्तक्षेप नहीं करेगी। इस बीच, राजनीतिक हलकों में यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। लालू यादव का मानना है कि उन्हें राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया गया है, जबकि सीबीआई का दावा है कि उनके पास आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं।

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