बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा मुंबई में बढ़ते वायु और ध्वनि प्रदूषण के मामले में अधिकारियों से सवाल पूछे जाने के संदर्भ में शहर का एक दृश्य।

मुंबई शहर में बढ़ता वायु और ध्वनि प्रदूषण अब एक गंभीर और चिंताजनक विषय बन चुका है। शहर की बिगड़ती हुई वायु गुणवत्ता और प्रदूषण के लगातार बढ़ते स्तर पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने बहुत ही सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई है कि प्रदूषण के मामले में मुंबई अब कई मामलों में दिल्ली को भी पीछे छोड़ती नजर आ रही है। हाई कोर्ट ने तीखा सवाल उठाते हुए पूछा है कि जब आम लोग और लाखों नागरिक इस खराब हवा और प्रदूषण के कारण लगातार परेशानी झेल रहे हैं, तो प्रदूषण रोकने की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी चैन की नींद कैसे सो सकते हैं?

अधिकारियों और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC), महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) और मुंबई पुलिस को जमकर फटकार लगाई है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि त्योहारों के दौरान ध्वनि प्रदूषण और पटाखे फोड़ने पर रोक लगाने से जुड़े जो निर्देश दिए गए थे, उन्हें मैदानी स्तर पर प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है। हाई कोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा है कि अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह नाकाम रहने वाले लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।

यह पूरा मामला ध्वनि प्रदूषण और सड़कों पर खुलेआम पटाखे फोड़े जाने से जुड़ी स्वतः संज्ञान वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान सामने आया है। इस मामले की सुनवाई जस्टिस गिरिश एस. कुलकर्णी और जस्टिस नीला गोखले की खंडपीठ कर रही है। अदालत का साफ तौर पर कहना था कि पुलिस प्रशासन अदालत के निर्देशों को लागू करने में भारी सुस्ती और लापरवाही दिखा रहा है।

पुलिस स्टेशन के सामने सरेआम फूटे पटाखे सुनवाई के दौरान अदालत ने मुंबई की एक खास घटना का विशेष रूप से जिक्र किया। दक्षिण मुंबई के क्रॉफर्ड मार्केट के पास मंगलवार को एक ऐसा मामला सामने आया जहां एक पुलिस स्टेशन के ठीक सामने व्यस्त सड़क पर सरेआम पटाखे फोड़े गए। अदालत ने इसे अपने आदेशों और नियमों का खुला उल्लंघन माना है।

इस घटना के बाद पीठ ने मुंबई पुलिस को सख्त निर्देश दिए हैं कि जुलूसों और आयोजनों में इस्तेमाल होने वाले साउंड सिस्टम के लाइसेंस की बारीकी से जांच की जाए। इसके साथ ही त्योहारों के दौरान सड़कों पर पटाखे फोड़ने पर पूरी तरह से प्रतिबंध सुनिश्चित करने के आदेशों का सख्ती से पालन करवाने को कहा गया है। अदालत ने मुंबई पुलिस आयुक्त को सभी पुलिस थानों के प्रभारियों के साथ विशेष बैठक करने और कोर्ट के सभी निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया है।

मौलिक अधिकारों का हनन और अधिकारियों की जवाबदेही बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि बढ़ते प्रदूषण पर लगाम लगाने में अधिकारियों की यह निष्क्रियता सीधे तौर पर भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। अदालत ने प्रशासन की जवाबदेही तय करते हुए बीएमसी आयुक्त और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) के आयुक्त को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने उन्हें प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए अब तक उठाए गए ठोस कदमों की पूरी रिपोर्ट पेश करने को भी कहा है।

निर्माण स्थलों की धूल और घटती दृश्यता पर चिंता अदालत ने शहर में चल रहे निर्माण स्थलों (Construction Sites) से निकलने वाली धूल और कचरे पर नियंत्रण के लिए पर्याप्त कार्रवाई न किए जाने पर भी कड़ा सवाल उठाया है। जस्टिस गिरिश एस. कुलकर्णी ने साफ शब्दों में कहा कि निर्माण गतिविधियां शहर में प्रदूषण फैलने की एक सबसे बड़ी वजह हैं, और नियमों का खुला उल्लंघन करने वाले बिल्डरों पर भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए। वहीं, जस्टिस नीला गोखले ने यह भी रेखांकित किया कि शहर के कुछ चुनिंदा साफ-सुथरे इलाकों के प्रदूषण आंकड़ों को दिखाकर उन हिस्सों की बेहद खराब वायु गुणवत्ता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जहां यातायात का दबाव बहुत अधिक है और आबादी घनी है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर भी गहरी चिंता व्यक्त की कि मंगलवार को धुंध और स्मॉग (Smog) की वजह से मुंबई में दृश्यता (Visibility) 500 मीटर से भी नीचे तक चली गई थी। अदालत ने तंज कसते हुए कहा कि मुंबई के पास एक विशाल समुद्र तट और प्राकृतिक समुद्री हवाएं होने के बावजूद आज यह शहर गंभीर प्रदूषण का सामना करने को विवश है।

जनजागरूकता और लोगों की भागीदारी की जरूरत बॉम्बे हाई कोर्ट ने सुझाव देते हुए कहा कि प्रशासन को प्रदूषण के गंभीर दुष्प्रभावों के बारे में आम जनता को जागरूक करना चाहिए। इसके लिए समाचार माध्यमों, सोशल मीडिया और लोकप्रिय फिल्मी हस्तियों के जरिए विशेष अभियानों का संचालन किया जाना चाहिए।

अदालत का मानना है कि ध्वनि प्रदूषण और पटाखों से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए लोगों के दैनिक व्यवहार में बदलाव लाना बहुत जरूरी है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि आज आम नागरिकों को घर से बाहर कदम रखने से पहले वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) देखने की मजबूरी उठानी पड़ रही है। प्रदूषण पर स्थाई नियंत्रण पाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कड़े कदम उठाने के साथ-साथ नागरिकों की सक्रिय भागीदारी होना भी उतना ही अनिवार्य है।