महाराष्ट्र: 3 साल से अटके ग्राम पंचायत चुनाव, पूर्व सरपंचों ने हाई कोर्ट का किया रुख
सरकारी प्रशासकों के भरोसे चल रही ग्राम पंचायतों के विकास कार्य प्रभावित, चुनाव कराने या पूर्व सरपंचों को प्रभार देने की मांग।
तस्वीर में सरपंच संगठन के जिला प्रचार प्रमुख विलास नवघरे नजर आ रहे हैं।
समुद्रपुर। महाराष्ट्र के कई गांवों में पिछले तीन वर्षों से ग्राम पंचायतों के चुनाव नहीं होने के कारण ग्रामीण प्रशासन और विकास कार्यों पर असर पड़ रहा है। सरकारी प्रशासकों के भरोसे चल रही ग्राम पंचायतों में स्थानीय समस्याओं के समाधान और विकास कार्यों को गति देने का मुद्दा लगातार गंभीर होता जा रहा है। पूर्व सरपंचों को प्रशासक के रूप में नियुक्त कर ग्राम पंचायतों का कारभार जनप्रतिनिधियों के हाथों में रखने की मांग को लेकर सरपंच संगठन और पदाधिकारियों ने मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ का रुख किया है। हालांकि, मामले में बार-बार तारीख मिलने से निर्णय लंबित है।
जानकारी के अनुसार, 1 जनवरी 2026 के बाद रिक्त हुई ग्राम पंचायतों में मौजूदा सरपंचों को छह महीने के लिए प्रशासक का प्रभार दिया गया था। हालांकि, इस दौरान उन्हें वित्तीय खर्च करने और बड़े निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया गया। छह महीने की अवधि समाप्त होते ही सरकार ने पुराना राजपत्र रद्द कर दिया और सरकारी कर्मचारियों को प्रशासक नियुक्त कर दिया। इनमें विस्तार अधिकारी, केंद्र प्रमुख, आंगनवाड़ी सुपरवाइजर और कृषि विभाग के अधिकारी शामिल हैं।
स्थिति यह है कि एक-एक अधिकारी के पास चार-चार गांवों की जिम्मेदारी है। आरोप है कि ये अधिकारी गांवों में नियमित रूप से नहीं पहुंचते, जिसके कारण नागरिकों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए तालुका मुख्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं। स्थानीय जरूरतों और ग्रामीणों की समस्याओं से परिचित जनप्रतिनिधियों के स्थान पर सरकारी अधिकारियों के माध्यम से ग्राम पंचायतों का संचालन होने से गांवों के विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
राज्य के कई हिस्सों में सूखे जैसी परिस्थितियां पैदा हो गई हैं। ग्रामीणों को पानी की कमी, रोजगार, पशुओं के लिए चारा और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति और स्थानीय जरूरतों को समझने वाले जनप्रतिनिधियों की ग्राम पंचायतों के कामकाज में भूमिका जरूरी बताई जा रही है। इसी मांग को लेकर सरपंच संगठन और पदाधिकारियों ने उच्च न्यायालय में याचिका का रास्ता अपनाया है, लेकिन बार-बार तारीख मिलने से ग्राम पंचायतों के प्रशासन से जुड़ा सवाल अब तक अनिर्णीत है। इसका असर विकास कार्यों के साथ नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याओं पर भी पड़ रहा है।
सरपंच संगठन की मांग है कि पूर्व सरपंचों को प्रशासक के रूप में नियुक्त कर ग्राम पंचायतों का संचालन जनप्रतिनिधियों के हाथों में रखा जाए। संगठन का कहना है कि ग्राम पंचायतों से जुड़े मुद्दों पर जल्द निर्णय लेना समय की जरूरत है। मुख्यमंत्री और ग्राम विकास मंत्री को हस्तक्षेप कर इस संबंध में उचित फैसला लेना चाहिए। साथ ही, ग्राम पंचायतों के चुनाव जल्द से जल्द कराए जाएं, ताकि स्थानीय स्वशासन संस्थाओं का संचालन निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के हाथों में सौंपा जा सके।
तीव्र आंदोलन की चेतावनी
सरपंच संगठन ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार को लोकसभा, विधानसभा और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव कराने के लिए समय मिल जाता है, लेकिन ग्राम पंचायतों के चुनाव क्यों नहीं कराए जा रहे हैं। संगठन ने चेतावनी दी कि सरकार ग्रामीणों और पूर्व सरपंचों के धैर्य की परीक्षा न ले। स्थिति हाथ से निकलने से पहले मुख्यमंत्री और ग्राम विकास मंत्री को मामले में हस्तक्षेप कर सकारात्मक कदम उठाना चाहिए।
संगठन का कहना है कि गांवों के अधिकार, विकास, जनप्रतिनिधियों की शक्तियों और ग्रामीण जनता को न्याय दिलाने के लिए ‘तारीख पे तारीख’ का सिलसिला बंद होना चाहिए। यदि तत्काल ग्राम पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं है, तो मौजूदा सरपंचों को प्रशासक नियुक्त किया जाए, ताकि सरकारी प्रशासकों के माध्यम से ठप पड़े गांवों के विकास को गति मिल सके।
सरपंच संगठन के जिला प्रचार प्रमुख विलास नवघरे ने कहा कि ग्रामीण जनता को न्याय दिलाने के लिए संगठन जल्द ही अपना आंदोलन और तेज करेगा। अब ग्राम पंचायतों के चुनाव और प्रशासकों की नियुक्ति को लेकर सरकार के निर्णय पर ग्रामीण क्षेत्रों की निगाहें टिकी हैं।