मंगरुळपीर में रिश्वतखोर तत्कालीन PSI वैभव पराते को 3 साल की सश्रम कैद, 25 हजार जुर्माना
महाराष्ट्र के वाशिम जिले के मंगरुळपीर में हिरासत में लिए गए व्यक्ति को छोड़ने के बदले रिश्वत मांगने के मामले में तत्कालीन PSI वैभव पराते को तीन साल की सश्रम कैद और 25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। जानें, जांच और सुनवाई में कौन से साक्ष्य अहम रहे।
महाराष्ट्र के वाशिम जिले के मंगरुळपीर में हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति को छोड़ने के बदले रिश्वत मांगने और स्वीकार करने के मामले में तत्कालीन पुलिस उपनिरीक्षक (वर्ग-2) वैभव दामोदर पराते को तीन साल की सश्रम कैद और 25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई है। मंगरुळपीर के अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत यह फैसला सुनाया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश श्रीमती पी. एस. काळे ने 22 अक्टूबर 2026 को आदेश जारी किया।
दोषी ठहराए गए वैभव दामोदर पराते (40 वर्ष) नागपुर के सोमलवार हाईस्कूल के सामने स्थित त्रिशरण नगर के निवासी हैं। मामला 12 अप्रैल 2016 का है, जब शिकायतकर्ता के एक मित्र के खिलाफ निवारक कार्रवाई करते हुए उसे मंगरुळपीर पुलिस थाने में हिरासत में लिया गया था। आरोप के अनुसार, मित्र को छोड़ने के बदले तत्कालीन PSI वैभव पराते ने शिकायतकर्ता से 10 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी। बातचीत के बाद रिश्वत की रकम 5 हजार रुपये तय हुई।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने भ्रष्टाचार निरोधक विभाग में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के सत्यापन के दौरान आरोपी ने 3 हजार रुपये स्वीकार किए और शेष 2 हजार रुपये की मांग की। इस पर 25 अप्रैल 2016 को भ्रष्टाचार निरोधक विभाग ने जाल बिछाया। पुलिस थाने में स्थित अपने कक्ष में शेष 2 हजार रुपये की रिश्वत स्वीकार करते समय वैभव पराते को रंगे हाथों पकड़ लिया गया। इस मामले में मंगरुळपीर पुलिस थाने में अपराध दर्ज किया गया और जांच पूरी होने के बाद न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल किया गया।
मामले की विस्तृत जांच भ्रष्टाचार निरोधक विभाग के तत्कालीन जांच अधिकारी राहुल विष्णु गांगुर्डे ने की। मुकदमे की सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष की ओर से अतिरिक्त सरकारी अभियोजक (APP) एडवोकेट एस. के. गिमेकर ने पैरवी की। अभियोजन पक्ष ने कुल पांच गवाहों की गवाही दर्ज कराई। इनमें शिकायतकर्ता, पंच गवाह, जांच अधिकारी राहुल गांगुर्डे और तकनीकी साक्ष्यों से संबंधित पुलिस गवाह आतिश काळमुंदळे तथा गजानन उकागडे की गवाही महत्वपूर्ण रही।
रिश्वत की मांग के सत्यापन और कार्रवाई के दौरान मौजूद मुख्य पंच गवाह अविनाश चव्हाण का निधन हो जाने के कारण उनकी गवाही दर्ज नहीं की जा सकी। हालांकि, अन्य गवाहों की गवाही और फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर अभियोजन पक्ष ने आरोपी के खिलाफ आरोप सिद्ध किए।
दोनों पक्षों की दलीलों और न्यायालय के रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने वैभव पराते को दोषी ठहराया। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत उन्हें तीन साल की सश्रम कैद और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। वहीं, धारा 13(2) के साथ धारा 13(1)(ड) के तहत एक साल की सश्रम कैद और 5 हजार रुपये जुर्माना लगाया गया।
अदालत ने दोनों सजाएं एक साथ भुगतने का आदेश दिया है। जुर्माने की राशि जमा नहीं करने पर अतिरिक्त साधारण कारावास का भी प्रावधान किया गया है। इस प्रकार, दोनों धाराओं के तहत कुल 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है।
इस मुकदमे में भ्रष्टाचार निरोधक विभाग, वाशिम की पुलिस निरीक्षक अलका गायकवाड ने पैरवी अधिकारी के रूप में जिम्मेदारी निभाई। पुलिस निरीक्षक तथा वाचक रवींद्र सहारे ने निराकरण टिप्पणी अधिकारी के रूप में कामकाज संभाला, जबकि भ्रष्टाचार निरोधक विभाग, वाशिम के गजानन ढगे ने कोर्ट अमलदार के रूप में सहयोग किया।
पूरी न्यायिक प्रक्रिया भ्रष्टाचार निरोधक विभाग, अमरावती परिक्षेत्र के अपर पुलिस अधीक्षक सुनील किनगे के मार्गदर्शन और वाशिम यूनिट के पुलिस उपाधीक्षक जगदीश परदेशी की निगरानी में आगे बढ़ी। करीब दस साल पुराने इस रिश्वतखोरी मामले में अदालत का फैसला सरकारी पक्ष द्वारा प्रस्तुत गवाहियों और फॉरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर आया है।