सहसपुर: रेशम उत्पादन पर 5 दिवसीय प्रौद्योगिकी उन्मुखीकरण कार्यक्रम संपन्न
केंद्रीय रेशम बोर्ड ने 34 प्रतिभागियों को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों और रेशमकीट पालन का प्रशिक्षण दिया; IIT रुड़की सहयोग और सेलाकुई भ्रमण शामिल।
सहसपुर के क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र में आयोजित प्रशिक्षण के समापन पर प्रतिभागी।
केंद्रीय रेशम बोर्ड, वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र, सहसपुर में 21 से 25 अक्टूबर 2026 तक आयोजित पांच दिवसीय प्रौद्योगिकी उन्मुखीकरण कार्यक्रम में 34 प्रतिभागियों को रेशम उत्पादन की आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों, अनुसंधान उपलब्धियों और व्यावहारिक प्रक्रियाओं का प्रशिक्षण दिया गया। इसमें श्री गुरु राम राय कॉलेज, देहरादून के 19 विद्यार्थी और रेशम निदेशालय, देहरादून के विभिन्न राजकीय रेशम कार्यालयों से नामांकित 15 कर्मचारी शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्देश्य प्रतिभागियों की तकनीकी दक्षता और कार्यक्षमता को मजबूत करना था, ताकि वे वैज्ञानिक विधियों को समझकर उनका प्रभावी उपयोग कर सकें।
कार्यक्रम का समन्वयन डॉ. साक्षी वैष्णव, वैज्ञानिक-बी एवं प्रशिक्षण समन्वयक, तथा डॉ. अरसाकुमार ई., वैज्ञानिक-बी ने किया। यह आयोजन केंद्र प्रमुख डॉ. पवन सैनी, वैज्ञानिक-डी के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत प्रतिभागियों के पंजीकरण और प्रशिक्षण किट वितरण के साथ हुई।
पांच दिवसीय प्रशिक्षण में रेशमकीट प्रजनन के सिद्धांतों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण, रेशम उत्पादन के परिचय, शहतूत की खेती एवं रोपण प्रबंधन, रेशमकीट पालन की वैज्ञानिक विधियों और गुणवत्तापूर्ण रेशमकीट बीज उत्पादन पर व्याख्यान आयोजित किए गए। प्रतिभागियों को मूल बीज फार्मों की भूमिका और रेशमकीट बीज उत्पादन की उन्नत तकनीकों की जानकारी भी दी गई। इसके अलावा, रेशमकीट पालन गृहों और उपकरणों के विसंक्रमण, रेशमकीट एवं शहतूत की बीमारियों की पहचान, निदान और प्रबंधन, एकीकृत कृषि प्रणाली में रेशम उत्पादन की भूमिका तथा कोया गुणवत्ता के मूल्यांकन से जुड़ी तकनीकी प्रक्रियाओं पर प्रशिक्षण दिया गया।
कार्यक्रम में केंद्रीय रेशम बोर्ड के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक डॉ. आबाद अहमद सिद्दीकी सहित बोर्ड की विभिन्न इकाइयों में कार्यरत वैज्ञानिकों और केंद्र प्रभारियों ने संसाधन व्यक्तियों के रूप में भाग लिया। इनमें डॉ. विक्रम कुमार, वैज्ञानिक-सी एवं प्रभारी, पी-3 मूल बीज फार्म, माजरा; डॉ. प्रशांत जे., वैज्ञानिक-बी एवं प्रभारी, रेशमकीट बीज उत्पादन केंद्र, मीठीबेरी, प्रेमनगर; श्री अभिषेक सिंह, वैज्ञानिक-सी एवं प्रभारी, पी-2 मूल बीज फार्म, शीशमबाड़ा; तथा श्री राहुल पाल, वैज्ञानिक-बी (रीलिंग एवं स्पिनिंग) एवं प्रभारी, रेशम तकनीकी सेवा केंद्र, प्रेमनगर, देहरादून शामिल रहे। क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र, जम्मू की वैज्ञानिक-बी डॉ. रुबिया बुखारी ने भी अतिथि वक्ता के रूप में विशेषज्ञ व्याख्यान दिया।
विशेषज्ञों ने अपने अनुसंधान अनुभव, वैज्ञानिक ज्ञान और क्षेत्रीय स्तर पर अर्जित व्यावहारिक अनुभव प्रतिभागियों के साथ साझा किए। इससे विद्यार्थियों को रेशम उत्पादन के क्षेत्र में अनुसंधान, नवाचार और व्यावसायिक संभावनाओं को समझने का अवसर मिला। वहीं, रेशम निदेशालय के कर्मचारियों को उन्नत तकनीकों के प्रभावी क्रियान्वयन, क्षेत्रीय समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान और किसानों तक नवीन तकनीकों का प्रसार करने के संबंध में मार्गदर्शन मिला।
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को रेशम संग्रहालय का शैक्षणिक भ्रमण कराया गया। इसके साथ ही कोया शिल्प निर्माण, रेशमकीट पालन गृहों और उपकरणों के विसंक्रमण, शहतूत पौधरोपण एवं रखरखाव, कोया नमूनाकरण, सुखाने, छंटाई और श्रेणीकरण तथा रेशमकीट बीज उत्पादन की विभिन्न प्रक्रियाओं का व्यावहारिक प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन किया गया।
प्रतिभागियों ने केंद्रीय रेशम बोर्ड और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की के संयुक्त अनुसंधान एवं तकनीकी सहयोग से स्थापित आदर्श एवं वहनीय रेशमकीट पालन गृह का भी भ्रमण किया। यहां उन्होंने नियंत्रित तापमान और आर्द्रता की परिस्थितियों में संचालित पछेती शरदकालीन रेशमकीट पालन गतिविधियों तथा उनकी प्रगति का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। उन्हें आधुनिक पालन गृह की संरचना, संचालन प्रणाली, पर्यावरणीय नियंत्रण व्यवस्था और वैज्ञानिक प्रबंधन पद्धतियों के बारे में भी जानकारी दी गई।
कोसोत्तर प्रौद्योगिकी की जानकारी देने के उद्देश्य से प्रतिभागियों को उत्तराखंड को-ऑपरेटिव रेशम फेडरेशन लिमिटेड, प्रेमनगर के अंतर्गत संचालित ग्रोथ सेंटर, सेलाकुई का शैक्षणिक एवं तकनीकी भ्रमण कराया गया। यहां उन्होंने कोया प्रसंस्करण, रेशम धागा निकालने यानी रीलिंग की प्रक्रिया और कोसोत्तर प्रौद्योगिकी से संबंधित गतिविधियों को प्रत्यक्ष रूप से देखा। इस दौरान उन्हें कोया उत्पादन से रेशम धागा निर्माण तक की तकनीकी प्रक्रियाओं और मूल्य संवर्धन के विभिन्न पहलुओं को समझने का अवसर मिला।
सैद्धांतिक व्याख्यानों, व्यावहारिक प्रशिक्षण सत्रों और तकनीकी भ्रमणों के माध्यम से प्रतिभागियों को शहतूत की खेती से लेकर रेशमकीट पालन, कोया उत्पादन और रेशम रीलिंग तक की संपूर्ण उत्पादन शृंखला की व्यापक जानकारी दी गई। प्रशिक्षण के अंतिम दिन प्रतिभागियों से कार्यक्रम के संबंध में प्रतिक्रिया ली गई और अर्जित ज्ञान एवं तकनीकों के क्षेत्रीय स्तर पर प्रभावी अनुप्रयोग की संभावनाओं पर चर्चा की गई। समापन सत्र में सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र एवं स्मृति-चिह्न वितरित किए गए। कार्यक्रम की स्मृति में समूह छायाचित्र भी लिया गया।
सहसपुर में आयोजित यह पांच दिवसीय प्रौद्योगिकी उन्मुखीकरण कार्यक्रम विद्यार्थियों और रेशम निदेशालय के कर्मचारियों की वैज्ञानिक समझ, तकनीकी दक्षता तथा व्यावहारिक कौशल को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण रहा। इसके साथ ही, इस पहल ने केंद्रीय रेशम बोर्ड की विभिन्न इकाइयों, शैक्षणिक संस्थानों और राज्य रेशम निदेशालय के बीच तकनीकी ज्ञान के आदान-प्रदान, संस्थागत समन्वय और सहयोग को प्रोत्साहित किया।