21 साल पुराने हिरासत में मौत केस में दो पूर्व पुलिसकर्मियों को उम्रकैद, जेल भेजे गए
एटा के जैथरा थाने में वर्ष 2005 में मोहरपाल उर्फ पप्पू की पुलिस हिरासत में मौत के मामले में अदालत ने दो पूर्व पुलिसकर्मियों को उम्रकैद सुनाई। दोषसिद्धि के बाद दोनों की जमानत निरस्त कर जेल भेज दिया गया।
तस्वीर में एटा की अदालत और जैथरा थाने का बोर्ड दिखाई दे रहा है, जिसके बाहर कुछ लोग खड़े नजर आ रहे हैं।
एटा में करीब 21 साल पुराने पुलिस हिरासत में मौत के मामले में सत्र अदालत ने बुधवार, 12 अगस्त 2026 को दो पूर्व पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। सत्र न्यायाधीश राकेश धर दुबे ने महावीर सिंह और गजराज सिंह को वर्ष 2005 में जैथरा थाने में मोहरपाल उर्फ पप्पू की हत्या, अवैध हिरासत, मारपीट और साक्ष्य मिटाने के मामले में दोषी करार दिया। दोषसिद्धि के बाद दोनों की जमानत निरस्त कर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इसके बाद दोनों को एटा जिला जेल भेज दिया गया।
अदालत ने दोनों दोषियों को आईपीसी की धारा 302/34 के तहत हत्या के मामले में उम्रकैद और 25-25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इसके अलावा धारा 504 में एक-एक साल की सजा और एक-एक हजार रुपये जुर्माना, धारा 506 में दो-दो साल की सजा और दो-दो हजार रुपये जुर्माना, धारा 342 में एक-एक साल की सजा और 500-500 रुपये जुर्माना तथा धारा 201 में सात-सात साल की सजा और तीन-तीन हजार रुपये जुर्माना लगाया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
मामला 26 अगस्त 2005 का है। अभियोजन के अनुसार ग्राम प्रधान के चुनाव को लेकर बघौ गांव में विवाद हुआ था। सूचना मिलने पर पुलिस टीम मौके पर पहुंची और आरोप है कि पुलिसकर्मी मोहरपाल उर्फ पप्पू को जबरन पकड़कर जैथरा थाने ले गए। आरोप है कि थाने में उसे हिरासत में रखकर बेरहमी से पीटा गया।
अभियोजन के मुताबिक अगले दिन भी परिजनों और प्रत्यक्षदर्शियों ने मोहरपाल को थाने की हवालात में पुलिसकर्मियों द्वारा पीटे जाते देखने की बात कही थी। बाद में थाने में ही उसकी मौत होने का आरोप लगा।
मोहरपाल की मौत के बाद उसके शव को गायब करने और घटना से जुड़े साक्ष्य मिटाने का भी आरोप पुलिसकर्मियों पर लगा। अभियोजन का कहना था कि पुलिसकर्मी शव को एक निजी जीप में ले गए और उसे गायब करने का प्रयास किया। साथ ही घटना से जुड़े साक्ष्यों को मिटाने की कोशिश किए जाने का आरोप भी लगाया गया।
मामले में मोहरपाल का शव बरामद नहीं हो सका। बाद में नदी किनारे एक कंकाल मिलने के बाद उसकी पहचान को लेकर भी मुकदमे में सवाल उठे। बचाव पक्ष ने कंकाल की उम्र और उसकी पहचान पर सवाल खड़े करते हुए दावा किया कि वह मोहरपाल का नहीं हो सकता।
हालांकि अदालत ने प्रत्यक्षदर्शी गवाहों, दस्तावेजी साक्ष्यों और घटनाक्रम की अन्य कड़ियों को महत्वपूर्ण मानते हुए महावीर सिंह और गजराज सिंह को दोषी ठहराया।
इस मामले में शुरुआत में तत्कालीन थाना प्रभारी मनीष यादव, महावीर सिंह, मिड्ढईलाल उर्फ मिड्ढाईलाल और गजराज सिंह को आरोपी बनाया गया था। मुकदमे की लंबी सुनवाई के दौरान मनीष यादव और मिड्ढईलाल की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई। शेष दो आरोपियों महावीर सिंह और गजराज सिंह के खिलाफ मुकदमा चलता रहा।
सजा सुनाते हुए अदालत ने माना कि थाने में मोहरपाल की पिटाई कर उसकी हत्या करना और इसके बाद साक्ष्य मिटाने का प्रयास गंभीर अपराध है। हालांकि अदालत ने मामले को ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ श्रेणी में नहीं माना। इसी आधार पर दोनों दोषियों को मृत्युदंड के बजाय उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
12 अगस्त 2026 को फैसला सुनाए जाने के समय दोनों आरोपी जमानत पर थे। दोषसिद्धि के बाद अदालत ने उनकी जमानत निरस्त कर दोनों को न्यायिक हिरासत में लेने का आदेश दिया। इसके बाद महावीर सिंह और गजराज सिंह को एटा जिला जेल भेज दिया गया। 21 साल पुराने इस मामले में अदालत के फैसले के साथ दोनों जीवित आरोपियों के खिलाफ चली लंबी न्यायिक प्रक्रिया का यह अहम चरण पूरा हुआ।