सागवाड़ा में नौ दिवसीय सिद्धचक्र विधान श्रद्धा-भक्ति के साथ संपन्न, विधानाचार्य जनक शास्त्री ने दिया आत्मकल्याण का संदेश

सागवाड़ा में विधानाचार्य जनक शास्त्री के सानिध्य में नौ दिवसीय सिद्धचक्र विधान श्रद्धा और विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने नवपद एवं सिद्ध परमेष्ठी की आराधना की। समापन पर आत्मकल्याण, विश्व शांति और सुख-समृद्धि का संदेश दिया गया।

Update: 2026-07-31 08:05 GMT

तस्वीर में सागवाड़ा में आयोजित नौ दिवसीय सिद्धचक्र विधान के दौरान महिलाएं अर्घ्य समर्पित करते हुए नजर आ रही हैं और इनसेट में विधानाचार्य जनक शास्त्री का सम्मान किया जा रहा है।

सागवाड़ा में जैन धर्म का अत्यंत पवित्र एवं मंगलकारी धार्मिक अनुष्ठान सिद्धचक्र विधान नौ दिनों तक श्रद्धा, भक्ति और विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। विधानाचार्य जनक शास्त्री के सानिध्य में आयोजित इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर नवपद एवं सिद्ध परमेष्ठी की आराधना की।

सिद्धचक्र विधान को जैन धर्म में आत्मशुद्धि, कर्मों के क्षय, पापों के प्रायश्चित तथा आध्यात्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण साधन माना जाता है। इस विधान के दौरान अनंतानंत सिद्ध परमेष्ठी, नवपद, सिद्धों के आठ गुण, सोलह कारण भावनाओं, चौंसठ ऋद्धियों तथा णमोकार मंत्र के पदों की विशेष आराधना की गई।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, मैना सुन्दरी द्वारा नवपद आराधना एवं सिद्धचक्र विधान के प्रभाव से राजा श्रीपाल और उनके साथियों के कुष्ठ रोग से मुक्त होने का प्रसंग इस विधान की महिमा को दर्शाता है। इसी आस्था और श्रद्धा के साथ श्रद्धालुओं ने नौ दिवसीय विधान में सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त किया।

समापन अवसर पर विधानाचार्य जनक शास्त्री ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सिद्धचक्र विधान आत्मकल्याण, संयम, सदाचार और मोक्षमार्ग की प्रेरणा देने वाला दिव्य अनुष्ठान है। कार्यक्रम के समापन पर श्रद्धालुओं ने विश्व शांति, सुख-समृद्धि एवं आत्मकल्याण की मंगलकामना की। इस अवसर पर श्रद्धालु नाचते-गाते अर्घ्य समर्पित करते नजर आए तथा समाजजनों ने विधानाचार्य का सम्मान भी किया।

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