मेवाड़ भास्कर उप प्रवर्तक कोमल मुनि का संदेश: 'स्व' का परिवर्तन ही सच्चा बदलाव, चातुर्मास में बताए साधना के सूत्र

खेरोदा में चातुर्मास प्रवचन के दौरान मेवाड़ भास्कर उप प्रवर्तक कोमल मुनि ने 'स्व' के परिवर्तन, समभाव और साधना का महत्व बताया, जबकि हर्षित मुनि जी ने सुखविपाक सूत्र का वाचन किया।

Update: 2026-08-01 12:33 GMT

तस्वीर में एक बड़े हॉल में फर्श पर बैठकर चातुर्मास प्रवचन सुनते हुए श्रद्धालु नजर आ रहे हैं।

मेवाड़ भास्कर उप प्रवर्तक कोमल मुनि ने चातुर्मास के दौरान आयोजित प्रवचन में जैन संतों के निरंतर विहार, चातुर्मास के महत्व और आत्म-परिवर्तन की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैसे बहता हुआ पानी सदैव निर्मल रहता है, उसी प्रकार साधु-संत निरंतर विहार करते हुए जन-जन तक धर्म का मार्ग पहुंचाते हैं।

प्रवचन के दौरान कोमल मुनि ने कहा कि चातुर्मास में संतों का एक स्थान पर ठहरना केवल प्रभु की आज्ञा का पालन, अहिंसा धर्म, सूक्ष्म जीवों की रक्षा और संयम की सुरक्षा के उद्देश्य से होता है। उन्होंने जीवन में वास्तविक परिवर्तन की व्याख्या करते हुए कहा कि व्यक्ति जीवनभर दूसरों को बदलने का प्रयास करता रहता है, जबकि सच्चा परिवर्तन 'पर' को नहीं, बल्कि 'स्व' को बदलने में है। जब तक आत्म-दर्शन नहीं होता, तब तक जीवन में वास्तविक बदलाव संभव नहीं है।

उन्होंने आगे कहा कि इस परिवर्तन की शुरुआत मन से होती है। जब मन में सभी के प्रति शुभ विचार उत्पन्न होते हैं तो स्वभाव स्वतः निखर जाता है और सामान्य व्यक्ति भी महापुरुष बन सकता है। उन्होंने कहा कि संसार के सभी भौतिक पदार्थ नाशवान और अनित्य हैं, जबकि केवल आत्मा ही शाश्वत तथा अजर-अमर है।

साधना के मार्ग पर एकाग्रता के महत्व को स्पष्ट करते हुए कोमल मुनि ने कहा कि जैसे सुई में धागा पिरोने के लिए एकाग्रता आवश्यक होती है, उसी प्रकार साधना में भी एकाग्रता अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि एकाग्रता से ही समभाव का जन्म होता है। यदि जीवन में कोई कटु शब्द कहे या क्रोध करे, तो सच्चे धर्मात्मा को विचलित होने के बजाय समभाव बनाए रखना चाहिए। उन्होंने इसकी तुलना करते हुए कहा कि जैसे बादलों की गरज सुनकर किसान प्रसन्न होता है और मोर नृत्य करता है, वैसे ही विपरीत परिस्थितियों में भी समभाव बनाए रखना चाहिए।

इसी क्रम में अध्ययनशील हर्षित मुनि जी ने 'सुखविपाक सूत्र' का वाचन करते हुए श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक साधक को अपने जीवन में सदैव जिज्ञासावान बने रहना चाहिए।

प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और चातुर्मास के अवसर पर धर्मोपदेश का श्रवण किया।

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