अयोध्या कांड में मंथरा-कैकयी संवाद का प्रसंग, महंत बालकदास ने बताया भक्ति का मर्म
कानोड़ के खेताखेड़ा गांव में श्रीराम कथा के दौरान महंत बालकदास सिंगोली श्याम ने अयोध्या कांड के प्रसंग सुनाए। मंथरा-कैकयी संवाद, दो वरदान और श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास का भावपूर्ण वर्णन किया।
तस्वीर में कानोड़ के खेताखेड़ा गांव स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर में कथावाचक महंत बालकदास श्रद्धालुओं को श्रीराम कथा सुनाते हुए नजर आ रहे हैं।
कानोड़। निकटवर्ती खेताखेड़ा गांव स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर में चल रही श्रीराम कथा में कथावाचक महंत बालकदास सिंगोली श्याम ने अयोध्या कांड के प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भगवान का स्मरण करने मात्र से मनुष्य के भीतर का भय दूर हो जाता है। जीवन में विपरीत परिस्थितियां आने पर भी यदि मनुष्य प्रभु का चिंतन करता रहे तो उसका मन स्थिर और निर्भय बना रहता है।
महंत बालकदास ने कहा कि मनुष्य को जीवन केवल बैठने, खाने और बोलने के लिए नहीं मिला है। मनुष्य होते हुए भी यदि जीवन में सदाचार, संयम, सेवा और सद्भाव का भाव नहीं है तो वह पशु के समान जीवन जी रहा है। मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य भगवान की भक्ति, सत्संग और अच्छे कर्म करना है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि भगवत कथा को केवल सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे भगवत भाव से सुनकर जीवन में उतारना चाहिए।
सत्संग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि सत्संग मनुष्य के जीवन की दिशा बदलने का कार्य करता है। इस संसार में वास्तविक धनवान वही है, जिसके पास सद्विचार, संतोष, संस्कार और भगवान का नाम है। सांसारिक धन-संपत्ति स्थायी नहीं है, जबकि अच्छे संस्कार और प्रभु का स्मरण जीवनभर मनुष्य के साथ रहते हैं।
मंथरा-कैकयी संवाद के प्रसंग का वर्णन करते हुए कथावाचक ने बताया कि मंथरा ने कैकयी के मन में भ्रम और असंतोष पैदा किया, जिसके बाद घटनाक्रम ने अयोध्या की पूरी दिशा बदल दी। उन्होंने कहा कि मनुष्य को किसी के बहकावे में आकर निर्णय नहीं लेना चाहिए। मन में सद्भाव रखना भी सच्ची भक्ति का ही स्वरूप है।
महंत ने कहा कि जीवन में सदैव संयम से रहना चाहिए। क्रोध, मोह, लोभ और गलत सलाह मनुष्य के विवेक को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए किसी भी परिस्थिति में निर्णय लेने से पहले शांत मन से विचार करना जरूरी है।
कथा में महाराजा दशरथ और कैकयी के कोप भवन में हुए संवाद का मार्मिक प्रसंग भी सुनाया गया। कथावाचक ने बताया कि कैकयी ने महाराजा दशरथ से पूर्व में दिए गए दो वरदान मांग लिए। पहला वर भरत के राजतिलक का और दूसरा भगवान श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास देने का था।
कैकयी की मांग सुनकर महाराजा दशरथ अत्यंत व्यथित हो गए। श्रीराम के प्रति अपने प्रेम और दिए हुए वचन के बीच फंसे दशरथ की पीड़ा का कथावाचक ने भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम ने पिता के वचन की मर्यादा को सर्वोपरि मानते हुए वन जाने का निर्णय स्वीकार किया। यही श्रीराम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप की महानता है।
अयोध्या कांड के इन प्रसंगों को सुनकर कथा स्थल पर मौजूद श्रद्धालु भावविभोर हो गए। लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने श्रीराम कथा का श्रवण किया।