शरद पूर्णिमा विशेष: गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माताजी ने जैन संस्कृति के संरक्षण और विश्व शांति के लिए समर्पित किया जीवन
शरद पूर्णिमा विशेष में जानिए गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के 550 से अधिक ग्रंथों के साहित्य सृजन, हस्तिनापुर के जम्बूद्वीप, मांगीतुंगी की 108 फुट प्रतिमा, तीर्थ विकास, इंद्रध्वज विधान की स्वर्ण जयंती और जैन संस्कृति के संरक्षण में योगदान की विस्तृत जानकारी।
शरद पूर्णिमा के विशेष अवसर पर परम पूज्य गणिनी प्रमुख, आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी के तप, त्याग, साधना, साहित्य सृजन और जैन संस्कृति के संरक्षण में योगदान का स्मरण किया जा रहा है। उनका जीवन जैन धर्म के सिद्धांतों, अहिंसा, स्वाध्याय, तीर्थंकरों की जन्मभूमियों के विकास और विश्व शांति के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए समर्पित रहा है। हस्तिनापुर को अपनी कर्मभूमि बनाकर उन्होंने जैन संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन की ऐसी पहल की, जिसने धार्मिक साहित्य, आध्यात्मिक चिंतन और प्राचीन तीर्थों के विकास को नई दिशा दी।
जैन संस्कृति को अनादि और प्राचीन संस्कृति बताते हुए श्री ज्ञानमती माताजी के योगदान को आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत माना जाता है। उनका दीर्घ संयमित जीवन आत्मकल्याण के साथ-साथ जैन धर्म, जैन संस्कृति, प्राचीन तीर्थों के संरक्षण, तीर्थंकरों की जन्मभूमियों के विकास, शिक्षा, स्वाध्याय, अहिंसा और विश्व शांति के संदेश को समर्पित रहा है।
हस्तिनापुर से जैन संस्कृति के नवजागरण की शुरुआत हुई। परम पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने हस्तिनापुर (मेरठ) को अपनी कर्मभूमि बनाकर जैन संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन की ऐतिहासिक आधारशिला रखी। हस्तिनापुर भगवान कुंथुनाथ, शांतिनाथ और अरहनाथ तीन तीर्थंकरों की पावन जन्मभूमि है। माताजी की प्रेरणा से यहां श्री दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान की स्थापना हुई। इसी पावन भूमि पर जम्बूद्वीप रचना का निर्माण किया गया, जिसने जैन भूगोल, दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन को जनमानस तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जम्बूद्वीप केवल आध्यात्मिक रचना नहीं, बल्कि जैन दर्शन और ब्रह्मांड विज्ञान की सजीव प्रस्तुति के रूप में विश्वभर के श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना। हस्तिनापुर से ही गुरु मां की विकास यात्रा प्रारंभ हुई, जिसने आगे चलकर जैन संस्कृति और तीर्थ संरक्षण के अनेक कार्यों का स्वरूप लिया।
श्री ज्ञानमती माताजी के योगदान में साहित्य सृजन का विशेष स्थान है। उन्होंने अब तक 550 से अधिक ग्रंथों और पुस्तकों की रचना कर जैन साहित्य के भंडार को समृद्ध किया है। उन्होंने प्राकृत, संस्कृत आदि भाषाओं के ग्रंथों को आगम प्रमाणों के आधार पर सरल शब्दों और हिंदी भाषा में प्रस्तुत किया। इन रचनाओं में जैन धर्म के सिद्धांतों, आत्मशुद्धि की साधना और जनकल्याण की भावना को अभिव्यक्ति मिली है। उनका साहित्य आने वाली पीढ़ियों को जैन धर्म के सिद्धांतों, भगवान वीतराग की वाणी और आत्मकल्याण के मार्ग का बोध कराता रहेगा।
माताजी ने अपनी लेखनी, तप और त्याग के अनुभवों के आधार पर अनेक विधानों की रचना की। इन विधानों के माध्यम से श्रद्धालुओं को ऐसी आराधना का अनुभव होता है, मानो वे साक्षात समवशरण में बैठकर साधना कर रहे हों। उनके द्वारा रचित प्रमुख विधानों में कल्पद्रुम विधान, त्रिलोक महामंडल विधान, नंदीश्वर द्वीप विधान, सिद्धचक्र महामंडल विधान, शांति विधान और इंद्रध्वज विधान शामिल हैं।
इंद्रध्वज विधान की रचना के 50 वर्ष पूर्ण होने पर स्वर्ण जयंती महोत्सव 30 जुलाई से 26 अक्टूबर 2026 तक मनाया जा रहा है। यह आयोजन केवल एक विधान की स्वर्ण जयंती तक सीमित नहीं है, बल्कि श्री ज्ञानमती माताजी की दीर्घ आध्यात्मिक साधना और साहित्यिक तपस्या के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है। इस महोत्सव का संदेश है, "हर घर ध्वज लहरायेंगे, माँ ज्ञानमती के गुण गायेंगे।"
इसी क्रम में जयमाला क्रमांक 20 का अर्थ सहित पाठ उनकी जन्मतिथि 19 अगस्त को लेखक के परिवार को प्राप्त हुआ। परम पूज्य प्रज्ञाश्रमणी श्री चंदनामती माताजी के मुखारविंद से प्रतिदिन जयमाला का पाठ किया जाता है। इस पुण्य अवसर पर उदयभान जैन बड़जात्या की माता श्रीमती कमला देवी जैन बड़जात्या परिवार, कामां वालों ने जयपुर स्थित निवास पर पूज्य माताजी के चरणों में जूम और पारस चैनल के माध्यम से पूर्ण जयमाला अर्पित करने का सौभाग्य प्राप्त किया।
श्री ज्ञानमती माताजी के जीवन संदेश में स्वाध्याय का विशेष स्थान रहा है। उनका स्पष्ट संदेश रहा है कि मंदिर केवल दर्शन के स्थान न रहें, बल्कि ज्ञान और स्वाध्याय के केंद्र भी बनें। उनकी प्रेरणा रही है कि मंदिरों में स्वाध्याय की व्यवस्था हो तथा आवश्यकता और सुविधानुसार जैन पाठशालाओं, जैन छात्रावासों, जैन शिक्षा संस्थानों और जैन विश्वविद्यालयों का विकास किया जाए। जैन स्कूल, कॉलेज और जैन शिक्षा बोर्ड जैसी व्यवस्थाओं के विकास पर भी उन्होंने जोर दिया।
माताजी ने षट्खंडागम सहित जैन ग्रंथों के अध्ययन और स्वाध्याय को महत्व दिया। उन्होंने पद्मनंदि पंचविंशतिका ग्रंथ का स्वाध्याय किया और उसी ग्रंथ से वैराग्य की ओर कदम बढ़ाया। स्वाध्याय के माध्यम से उन्होंने जैन संस्कृति और जैन समाज के लिए अनेक उपकार किए तथा अनेक कृतियों का सृजन किया। उनका संदेश है कि जैन कुल में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जैन कुल की मर्यादा में रहना चाहिए और उसके विपरीत आचरण नहीं करना चाहिए। यह विचार आने वाले समय में भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि संस्कारित पीढ़ी का निर्माण केवल संपत्ति से नहीं, बल्कि शिक्षा और संस्कारों से होता है।
तीर्थों के विकास के क्षेत्र में भी श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से महत्वपूर्ण कार्य हुए। महाराष्ट्र के मांगीतुंगी में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की 108 फुट ऊंची भव्य प्रतिमा का निर्माण कराया गया। यह प्रतिमा अहिंसा, त्याग और वीतरागता के संदेश को विश्वभर तक पहुंचाने वाली ऐतिहासिक धरोहर के रूप में स्थापित हुई।
तीर्थंकरों की जन्मभूमियों के विकास के संकल्प के अंतर्गत माताजी ने भगवान ऋषभदेव, अजितनाथ, अभिनंदननाथ, सुमतिनाथ और अनंतनाथ स्वामी की जन्मभूमियों के विकास के लिए प्रयास किए। अयोध्या में जैन समाज की धार्मिक गतिविधियों और तीर्थ दर्शन के प्रति भी रुझान बढ़ा है। यहां भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत, जिनके नाम पर भारत का नाम पड़ा, की 31 फीट ऊंची प्रतिमा विराजमान कराकर मंदिर तैयार कराया गया। भगवान ऋषभदेव के 101 पुत्रों की स्मृति में मंदिर बनवाया गया, जिन्हें मोक्षगामी बताया गया है। इसके अतिरिक्त नवदेवता मंदिर, त्रिलोक रचना, 30 चौबीसी और सर्वतोभद्र महल जैसी सुंदर कृतियों का निर्माण कराया गया। श्रद्धालुओं के लिए वातानुकूलित भोजनशाला और आवास व्यवस्था भी विकसित की गई। ये कार्य माताजी की दूरदृष्टि और संकल्पशक्ति के उदाहरण हैं।
भगवान महावीर स्वामी की जन्मभूमि कुंडलपुर (नालंदा), काकंदी, श्रावस्ती, भदलपुर और अन्य जन्मभूमियों पर भी उनके प्रेरणास्रोत से विकास कार्य कराए गए। इन प्रयासों का उद्देश्य तीर्थंकरों की जन्मभूमियों का संरक्षण करना और जैन समाज को अपनी धार्मिक विरासत से जोड़ना रहा है।
श्री ज्ञानमती माताजी का चिंतन केवल जैन समाज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने संपूर्ण मानवता के लिए अहिंसा, शाकाहार और विश्व शांति का संदेश दिया। इन विषयों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक कार्यक्रम और संगोष्ठियां आयोजित कराई गईं। इन कार्यों को गति देने और क्रियान्वित कराने में परम पूज्य प्रज्ञाश्रमणी श्री चंदनामती माताजी तथा स्वस्ति श्री रवीन्द्र कीर्ति स्वामी की अहम भूमिका रही है। उन्हें सहयोग देने वालों में अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. जीवन प्रकाश जैन और मुख्य संयोजक प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन शामिल हैं।
माताजी के 93वें अवतरण दिवस और 75वें संयम दिवस के पावन अवसर पर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके उत्तम स्वास्थ्य और सभी संकल्पों की पूर्णता की मंगलकामना की गई। उनके तप, त्याग और ज्ञान की ज्योति से विश्वभर में जैन धर्म का प्रभाव बढ़ता रहे, ऐसी कामना की गई। उनका जीवन इस बात की प्रेरणा देता है कि गौरवशाली विरासत पर गर्व करने के साथ उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है।
देश की युवा पीढ़ी को संगठित करने के उद्देश्य से जनवरी 1977 में स्थापित अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद को स्थापना से अब तक श्री ज्ञानमती माताजी का आशीर्वाद, सानिध्य, विशेष मार्गदर्शन और दिशा-निर्देश प्राप्त होते रहे हैं। परिषद के 50वें स्वर्ण जयंती समारोह के अंतर्गत युवाओं को देश, शास्त्र और गुरु की रक्षा के लिए संगठित होने का संदेश दिया गया। युवाओं से प्राचीन जैन मंदिरों और पुरातात्विक धरोहरों का संरक्षण करने, जैन संस्कृति और परंपराओं को सुरक्षित रखने, साधु-संतों के आहार और विहार में सहयोग करने तथा आगम और प्राचीन ग्रंथों के संरक्षण, अध्ययन और पठन-पाठन को बढ़ावा देने का आह्वान किया गया। साथ ही, बच्चों को जैन संस्कार देने और उन्हें स्वाध्याय से जोड़ने पर जोर दिया गया।
उदयभान जैन बड़जात्या, महारानी फार्म, जयपुर ने कहा कि पूज्य माताजी के उपकारों का ऋण शब्दों से नहीं चुकाया जा सकता। उनका जीवन स्वयं जैन संस्कृति का एक जीवंत महाग्रंथ है। उन्होंने माताजी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा, "वंदामी गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी। वंदे, तप, त्याग और स्वाध्याय की महान साध्वी को, वंदे साक्षात सरस्वती स्वरूपा को, वंदे जैन संस्कृति की अमर ज्योति को।" उन्होंने शुभ मंगलकामनाओं के साथ माताजी के उत्तम स्वास्थ्य और उनके संकल्पों की पूर्णता की कामना की।