मध्य प्रदेश में कोसमी के आदिवासियों के प्रदर्शन और घर गिराए जाने के मामले के बाद मुख्यमंत्री आवास पर एक उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की गई|

आदिवासियों के सीहोर के कोसमी गांव में घर तोड़े जाने के विरोध के बाद, मध्य प्रदेश की राजनीति में बीजेपी के भीतर चल रही अंदरूनी कलह और दरारें खुलकर सामने आ गईं। हालांकि, देर रात मुख्यमंत्री आवास पर हुई उच्च स्तरीय बैठक के बाद इस मामले का पटाक्षेप हो गया और आदिवासी परिवारों ने अपना भोपाल मार्च रद्द कर दिया। मगर यह पूरा घटनाक्रम पार्टी के लिए कई असहज स्थितियां छोड़ गया है।

कोसमी गांव में घर तोड़े जाने के बाद वन विकास निगम के मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन करने वाले आदिवासियों को जब कोई हल नहीं मिला, तो उन्होंने पांच दिनों बाद भोपाल की ओर मार्च करने का फैसला किया। यह क्षेत्र बुधनी विधानसभा के अंतर्गत आता है, जहां से केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान विधायक रहे हैं। इस मार्च के जरिए मोहन सरकार पर दबाव बनाने की तैयारी थी, लेकिन देर रात हुई मीटिंग के बाद आदिवासी आधे रास्ते से ही वापस लौट गए।

इस कार्रवाई को लेकर वन विभाग का तर्क था कि यह अतिक्रमण हटाने के लिए की गई थी और वहां 2021 में पौधरोपण किया गया था। इसके विपरीत, पीड़ित परिवारों का कहना है कि वे वर्षों से वहां रह रहे हैं और पीढ़ियों से खेती कर रहे हैं, इसलिए वे अपनी जमीन को मान्यता देने की मांग कर रहे हैं। इस विवाद को तब और हवा मिली जब शिवराज सिंह चौहान ने मौके पर पहुंचकर अपनी ही सरकार के अधिकारियों को फटकार लगाई और पूछा कि बीजेपी को वोट देने वाले परिवारों को क्यों टारगेट किया जा रहा है।

गुरुवार देर रात आदिवासी प्रतिनिधियों और मुख्यमंत्री मोहन यादव के बीच हुई मीटिंग में सीएम ने भरोसा दिलाया कि मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है और सभी को पक्का इंसाफ मिलेगा। हालांकि, रात में सामने आई मीटिंग की तस्वीरों में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, सीएम मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल भले ही आसपास बैठे दिखे, लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज ने साफ इशारा कर दिया कि वे सहज नहीं थे।

इस पूरे प्रकरण ने बीजेपी के अंदर की दरारों को बाहर ला दिया है, जहां शिवराज के समर्थक और स्थानीय विधायक रामाकांत भार्गव प्रदर्शन में मौजूद रहे, जबकि पार्टी के अन्य लोगों ने चुप्पी साध रखी थी। चौहान खेमे के लोग मौजूदा सरकार में खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं क्योंकि मौजूदा सीएम ने कई पुराने फैसले पलट दिए हैं। अन्य नेता और विधायक भी प्रशासनिक स्तर पर सुनवाई न होने की शिकायत करते रहे हैं। यह पूरा मामला आदिवासियों से ज्यादा शिवराज सिंह चौहान के लिए सम्मान की लड़ाई बन चुका है।