नर्स सरला भट की चीखें 35 साल बाद भी गूंज रहीं, चार्जशीट ने जगाई न्याय की उम्मीद|
1990 में नर्स सरला भट की अपहरण के बाद हत्या कर दी गई थी। अब 35 साल बाद एसआईए ने श्रीनगर की अदालत में 737 पन्नों की चार्जशीट पेश की है।
नर्स सरला भट का प्रतीकात्मक चित्र।
जम्मू-कश्मीर राज्य जांच एजेंसी (SIA) ने वर्ष 1990 में हुई कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट की अपहरण और हत्या के मामले में श्रीनगर की विशेष अदालत में 737 पन्नों की एक विस्तृत चार्जशीट दाखिल की है। शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज (SKIMS) में स्टाफ नर्स के पद पर कार्यरत सरला भट का अपहरण जेकेएलएफ (JKLF) के आतंकवादियों द्वारा किया गया था, जिसके बाद उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इस घटना के 35 वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी परिवार को न्याय की प्रतीक्षा है।
सरला भट के चचेरे भाई पीके भट ने इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उस समय की सरकारों को कार्रवाई न करने के लिए जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने घटना के दौरान के उस मंजर को बयां किया जब सरला भट की हत्या के बाद उनके अंतिम संस्कार को भी बाधित किया गया। पीके भट के अनुसार, जब परिवार उनकी अस्थियों को लेने गया, तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि वहां मौजूद लोगों ने सरला भट की अस्थियों को जूतों से रौंदा और उन्हें पैरों से उछालकर अपमानित किया। परिवार के लिए यह स्थिति बेहद पीड़ादायक थी, जहां उन्हें अंतिम संस्कार की प्रक्रिया भी शांतिपूर्वक संपन्न नहीं करने दी गई।
पीके भट ने बताया कि उस समय कश्मीर घाटी में उग्रवाद अपने चरम पर था। सरला भट की हत्या के अगले ही दिन उनके घर पर विस्फोट किया गया, जिससे पूरा परिवार सहम गया। स्थानीय लोगों की मदद से परिवार को पीछे की दीवार फांदकर सुरक्षित स्थान पर जाना पड़ा, क्योंकि मुख्य द्वार से निकलना उनके लिए जानलेवा साबित हो सकता था। परिवार को धमकी दी गई और कश्मीर छोड़कर जाने को मजबूर किया गया। पीके भट ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2019 से पहले की परिस्थितियों और वर्तमान शांतिपूर्ण माहौल में काफी अंतर है।
न्याय में हुई इस अत्यधिक देरी पर दुख व्यक्त करते हुए पीके भट ने कहा कि अलग-अलग सरकारें पीड़ितों को न्याय दिलाने में विफल रहीं। उन्होंने जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक के विरुद्ध सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की है। सरला भट का यह मामला केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि यह उन हजारों कश्मीरी पंडितों के दर्द का प्रतीक है जो दशकों पहले अपनी जड़ों से विस्थापित हुए थे। 35 वर्षों के बाद दाखिल की गई यह चार्जशीट न्याय की दिशा में एक प्रशासनिक कदम है, जिसकी सुनवाई अब विशेष अदालत में होगी।