पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सिंधु जल संधि से जुड़ा बांध और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सिंधु जल संधि विवाद के संदर्भ में दिखाई दे रहे हैं।

सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक तनाव एक बार फिर गहरा गया है। हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) के एक हालिया फैसले के बाद पाकिस्तान इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश कर रहा है। हालांकि, जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है क्योंकि भारत ने इस अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के गठन और उसके फैसलों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।

इस्लामाबाद स्थित पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने औपचारिक आपत्ति जताते हुए भारत से छह दशक पुरानी इस संधि का पूरी तरह से पालन करने की मांग की है। पाकिस्तान का तर्क है कि यह जल संधि कानूनी रूप से बाध्यकारी है और कोई भी एकतरफा कदम उठाकर इसकी शर्तों या प्रावधानों में बदलाव नहीं कर सकता। पानी के बहाव में संभावित रुकावट को लेकर गहरी आशंकाओं से घिरा पाकिस्तान लगातार तीसरे पक्ष के मंचों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का सहारा लेकर भारत को बातचीत की मेज पर खींचने की कोशिश कर रहा है।

इसके विपरीत, नई दिल्ली ने बहुत स्पष्ट कर दिया है कि हेग ट्रिब्यूनल का गठन गैर-कानूनी तरीके से किया गया था, जो सिंधु जल संधि के मूल विवाद समाधान ढांचे का खुला उल्लंघन है। यही वजह है कि भारत ने इस ट्रिब्यूनल की किसी भी कार्यवाही में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया था। भारत के अनुसार, इस फोरम से जारी किसी भी आदेश का देश के संप्रभु फैसलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं बनता है।

भारतीय पक्ष का यह भी रुख है कि सिंधु जल संधि अभी भी पूरी तरह से स्थगित अवस्था में है। भारत ने बेहद कड़ी शर्त रखी है कि इस संधि पर किसी भी प्रकार के पुनर्विचार या बहाली के लिए पाकिस्तान को सबसे पहले सीमा पार आतंकवाद को रोकने के वास्ते ठोस, प्रामाणिक और स्थायी कदम उठाने होंगे, जिनकी सत्यता की पुष्टि की जा सके।

वैश्विक मंचों पर तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के जरिए अपनी बात मनवाने की इस्लामाबाद की तमाम कोशिशें भारत के इस मजबूत और अडिग रुख के आगे पूरी तरह बेअसर साबित हो रही हैं। पाकिस्तान के कूटनीतिक विकल्प लगातार सीमित होते जा रहे हैं और सिंधु जल के मोर्चे पर उसका हर नया दांव बेकार साबित हो रहा है।