चीन की बढ़ती चुनौती के बीच क्या भारत और जापान बनाएंगे एशिया का 'नया सुरक्षा कवच'?
जापानी प्रधानमंत्री सनाए तकाइची के दिल्ली दौरे का उद्देश्य चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत के साथ सुरक्षा और आर्थिक संबंधों को और अधिक मजबूत बनाना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री सनाए तकाइची दिल्ली में द्विपक्षीय वार्ता के दौरान।
जापानी प्रधानमंत्री सनाए तकाइची का मौजूदा भारत दौरा वैश्विक भू-राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। अपनी तीन दिवसीय यात्रा के दौरान, तकाइची ने भारत को जापान के सुरक्षा बदलाव और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए एक 'महत्वपूर्ण हिस्सा' के रूप में रेखांकित किया है। बीजिंग के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोलने वाले देशों में जापान वर्तमान में अग्रणी है, और तकाइची के नेतृत्व में टोक्यो अब भारत के साथ मिलकर एक सशक्त रणनीतिक गठबंधन बनाने की दिशा में सक्रिय है।
नई दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी के साथ हुई वार्ता में रक्षा, व्यापार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बायो-गैस इनिशिएटिव जैसे क्षेत्रों में कई अहम समझौते किए गए हैं। इन समझौतों का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच आर्थिक सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती प्रदान करना है। इसके अतिरिक्त, बातचीत में रुपये और येन में द्विपक्षीय व्यापार करने की संभावनाओं पर भी जोर दिया गया है, जिससे दोनों देशों की अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम हो सके। यह कदम तकनीकी और आर्थिक मोर्चे पर चीन के प्रभुत्व को चुनौती देने की एक व्यवस्थित कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि, विशेषज्ञ इस साझेदारी की चुनौतियों की ओर भी इशारा कर रहे हैं। वासेडा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बेन एस्कियोन के अनुसार, जापान की ओर से भारत को अपने सुरक्षा ढांचे में एक प्रमुख सहयोगी के रूप में देखने की इच्छा है, लेकिन भारत की तत्परता अक्सर चीन के साथ उसके बदलते संबंधों के आधार पर निर्धारित होती है। सीमा पर तनाव की स्थिति में भारत जापान और अमेरिका जैसे देशों के साथ अधिक सक्रिय सहयोग के पक्ष में रहता है, जबकि संबंधों में स्थिरता आने पर यह भूमिका सीमित हो सकती है।
जापानी विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि तकाइची की यह यात्रा न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए है, बल्कि घरेलू मोर्चे पर भी उनके लिए महत्वपूर्ण है। जापान में आर्थिक समस्याओं के कारण घटते जनसमर्थन के बीच, चीन के खिलाफ एक मजबूत वैश्विक गठबंधन का नेतृत्व करना तकाइची के लिए राजनीतिक लाभ का एक माध्यम बन सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे के समय से ही भारत-जापान के बीच 'खास रणनीतिक ग्लोबल पार्टनरशिप' पर काम चल रहा है, जिसे अब एक नए और अधिक गहन स्तर पर ले जाने का प्रयास किया जा रहा है। अंततः, भारत का इस रणनीति में शामिल होना केवल टोक्यो की उम्मीदों पर नहीं, बल्कि नई दिल्ली की अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय हितों की प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।