घरों में पड़ा सोना अब आएगा काम, सरकार ला रही नई गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम|
भारतीय घरों में रखे सोने को अर्थव्यवस्था से जोड़ने के लिए सरकार जूलर्स को कलेक्शन पॉइंट के रूप में इस्तेमाल करने का नया मॉडल तैयार कर रही है।
निष्क्रिय सोने को अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाने के लिए नई मोनेटाइजेशन योजना में जूलर्स की भागीदारी पर विचार किया जा रहा है।
भारतीय परिवारों के पास मौजूद लगभग 30,000 टन सोने को देश की अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए केंद्र सरकार एक नई रणनीति पर काम कर रही है। इस उद्देश्य से वर्ष 2015 में शुरू की गई 'गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम' के नए और अधिक प्रभावी संस्करण को लाने की तैयारी की जा रही है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, इस बार सरकार इस योजना में जूलर्स को सक्रिय रूप से शामिल करने की योजना बना रही है। यह पहली बार होगा जब जूलर्स को इस सरकारी योजना के कार्यान्वयन में एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि अगस्त महीने में इस नई नीति की घोषणा की जा सकती है।
इस योजना के पीछे मुख्य उद्देश्य सोने के आयात पर देश की निर्भरता को कम करना है। भारत में सोने की भारी मांग के कारण इसका बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है, जिसका सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार और चालू खाता घाटे पर पड़ता है। पिछले दो सप्ताहों में वरिष्ठ मंत्रियों, भारतीय रिजर्व बैंक के अधिकारियों, विभिन्न बैंकों और बुलियन इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बैठकें हुई हैं, जिसमें इस प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा की गई है। जानकारों का कहना है कि आगामी त्योहारी सीजन को ध्यान में रखते हुए सरकार इस योजना को गति प्रदान कर रही है, क्योंकि सोने की बढ़ती कीमतों और इंपोर्ट ड्यूटी में बढ़ोतरी का सीधा असर बाजार में जूलरी की मांग पर पड़ रहा है। मई महीने में सोने का आयात घटकर लगभग 12 अरब डॉलर दर्ज किया गया था।
प्रस्तावित फ्रेमवर्क के अनुसार, जूलर्स अब केवल व्यापारी नहीं, बल्कि कलेक्शन और एग्रीगेशन पॉइंट के रूप में कार्य करेंगे। उनकी मुख्य भूमिका पारदर्शिता और ट्रेसेबिलिटी बनाए रखते हुए ग्राहकों के सोने को अधिकृत रिफाइनर्स और बैंकों तक पहुंचाने की होगी। इस प्रक्रिया में जूलर्स को सोना इकट्ठा करने, उसकी शुद्धता की जांच करने, डिपॉजिट की प्रक्रिया पूरी करने और ट्रांजैक्शन में सहायता करने के बदले में एक निश्चित सर्विस या हैंडलिंग फीस प्रदान की जाएगी। यह मॉडल उन ऑपरेशनल चुनौतियों को दूर करने का प्रयास है, जिनके कारण 2015 की मूल योजना अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाई थी।
पिछली योजना की धीमी प्रगति का एक मुख्य कारण ग्राहकों की झिझक और संचालन संबंधी जटिलताएं थीं। पिछले 11 वर्षों में यह योजना मात्र 39 टन सोना ही मोनेटाइज कर पाई है। वर्तमान में केवल एक से तीन साल की अवधि वाला शॉर्ट-टर्म बैंक डिपॉजिट ही उपलब्ध है, जबकि मीडियम और लॉन्ग-टर्म स्कीम को बंद कर दिया गया है। भारत में सोने को केवल निवेश नहीं, बल्कि एक संपत्ति और भावनात्मक लगाव के रूप में देखा जाता है, जिसके कारण लोग अपने गहने बेचने या जमा करने में संकोच करते हैं। इसके अतिरिक्त, स्कीम के तहत मिलने वाला कम ब्याज भी ग्राहकों को आकर्षित करने में विफल रहा था। सरकार की अब कोशिश है कि जूलर्स के नेटवर्क का लाभ उठाकर लोगों के भरोसे को जीता जाए और इस महत्वपूर्ण आर्थिक संसाधन को उत्पादक कार्यों में उपयोग किया जा सके।