अशोक विष्णु पाल्येकर के निधन के बाद धन अभाव के कारण श्मशान घाट के बाहर छोड़े गए शव के संदर्भ में इलाके के एक घर का दृश्य।

गोवा से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो परिवार की आर्थिक मजबूरी और अंतिम संस्कार जैसी बुनियादी जरूरत के लिए पैसे न होने की स्थिति को सामने रखती है। परनेम इलाके में 65 वर्षीय अशोक विष्णु पाल्येकर की मौत के बाद उनके शव को उनकी दो बहनें श्मशान घाट के बाहर छोड़ गईं। बताया गया कि बहनों के पास भाई के अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी खरीदने तक के पैसे नहीं थे। दोनों बहनें विधवा हैं और गरीबों को मिलने वाली सरकारी सहायता के 2,000 रुपये महीने से अपना गुजारा करती हैं।

गोवा को देश के उन राज्यों में गिना जाता है जहां प्रति व्यक्ति आय काफी अधिक है। राज्य में महंगे बीच विला और पर्यटन से जुड़ी गतिविधियां भी हैं। लेकिन इसी राज्य के उत्तरी हिस्से में अशोक का परिवार बेहद गरीबी में जीवन गुजार रहा था। अशोक परनेम के कसारवर्णे इलाके के देउलवाड़ा वार्ड में रहते थे। उनके नाम पर कोई बड़ा घर नहीं था। वह करीब 20 वर्ग मीटर के एक छोटे से ढांचे में रहते थे। इस ढांचे में दो कमरे थे और इसकी दीवारें बिना प्लास्टर वाली लेटराइट ईंटों से बनी थीं। अब इस टूटे हुए ढांचे पर भी ताला लगा हुआ है।

अशोक कभी इस छोटे से घर में रहते थे तो कभी अपनी दो बहनों के घर चले जाते थे। दोनों बहनें परनेम के दूसरे गांवों में रहती थीं। दोनों विधवा थीं और आर्थिक रूप से कमजोर थीं। उनकी आय का मुख्य सहारा गरीबों को मिलने वाली 2,000 रुपये महीने की सरकारी मदद थी। अशोक पहले एक होटल में नौकरी करते थे और छोटे-मोटे काम करके अपनी जरूरतें पूरी करते थे।

करीब दो साल पहले अशोक का पैर काटना पड़ा। इसके बाद उनकी होटल की नौकरी भी चली गई। पैर कटने के बाद वह बैसाखी के सहारे चलते थे। उनकी देखभाल के लिए दोनों बहनें बारी-बारी से उनके साथ रहती थीं। अशोक की जिंदगी धीरे-धीरे अपने छोटे से घर और बहनों के घरों तक सीमित हो गई थी।

13 सितंबर को, गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले, अशोक अपने छोटे से घर में बीमार पड़ गए। उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें मुफ्त 108 एंबुलेंस से पास के कसारवर्णे हेल्थ सेंटर ले जाया गया। स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

इस मामले में एक गार्ड ने बताया कि उसने घटनाक्रम देखा था। उसके अनुसार, अशोक की मौत का रिकॉर्ड रजिस्टर में दर्ज नहीं किया गया था। उनकी मौत के बाद उनकी बहनों के सामने सबसे बड़ी समस्या उनके अंतिम संस्कार की थी। उन्हें जानकारी मिली थी कि परनेम म्युनिसिपल श्मशान घाट पर गरीब लोगों का अंतिम संस्कार मुफ्त किया जाता है।

बहनों ने अपने पास मौजूद थोड़े-बहुत पैसों को इकट्ठा किया और एक गाड़ी किराए पर ली। इसी गाड़ी से वे अशोक का शव लेकर परनेम म्युनिसिपल श्मशान घाट पहुंचीं। उस समय शाम हो चुकी थी। श्मशान घाट पर कोई अटेंडेंट मौजूद नहीं था। गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले वहां सन्नाटा था।

बहनों के पास शव के अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी खरीदने के पैसे नहीं थे। उनके पास शव को वापस ले जाने के लिए भी पैसे नहीं थे। ऐसी स्थिति में वे अपने भाई के शव को वहीं छोड़कर चली गईं। बताया गया कि उन्हें उम्मीद थी कि सरकार की ओर से उनके भाई का अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा। उनके लिए यह कोई शव को लावारिस छोड़ने की कोशिश नहीं थी, बल्कि आर्थिक मजबूरी के बीच बची हुई एक उम्मीद थी।

अगली सुबह पुलिस को श्मशान घाट में शव मिला। शुरुआती तौर पर पुलिस को लगा कि किसी बेघर व्यक्ति का शव यहां पड़ा है। शव की पहचान नहीं थी, इसलिए उसे एक लावारिस शव माना गया। बाद में परनेम पुलिस के सब-इंस्पेक्टर आदित्य गाड ने मामले की कड़ी कसारवर्णे इलाके में मौजूद उस छोटे से घर से जोड़ी।

पुलिस को अशोक की बहनों के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद पूरे मामले की तस्वीर सामने आई। एक पड़ोसी ने बताया कि पैर कटने से पहले अशोक होटल में छोटे-मोटे काम करते थे। वह और उनका परिवार लंबे समय से आर्थिक परेशानियों से जूझ रहा था।

परिवार की मुश्किलें कई साल पहले भी बढ़ गई थीं। करीब दस साल पहले अशोक के बड़े भाई की मौत हो गई थी। उनका बड़ा भाई खदानों में ट्रक चलाता था और उसने परिवार के लिए लेटराइट पत्थरों से यह छोटा सा घर बनवाया था। उसकी मौत के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति और खराब हो गई।

पैर कटने के बाद अशोक बैसाखी के सहारे अपने घर और दोनों बहनों के घरों के बीच ही आते-जाते थे। उनकी देखभाल भी दोनों बहनें बारी-बारी से करती थीं। परिवार के पास इलाज और रोजमर्रा की जरूरतों के साथ अंतिम संस्कार के खर्च के लिए भी पर्याप्त पैसे नहीं थे।

पुलिस को जब उनकी बहनों का पता चला, तो बिना पोस्टमार्टम के शव उन्हें सौंप दिया गया। सब-इंस्पेक्टर आदित्य गाड के अनुसार, परिवार बेहद गरीब था और उनके पास अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी खरीदने तक के पैसे नहीं थे।

इसके बाद दूर के रिश्तेदारों ने पैसे इकट्ठा किए। इन पैसों से अशोक का शव पणजी के सेंट इनेज़ श्मशान घाट ले जाया गया, जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया।