प्रकृति की कीमत पर विकास नहीं CJI सूर्यकांत बोले- पर्यावरण न्याय का 'बरगद' है सुप्रीम कोर्ट, विकास और संरक्षण में संतुलन जरूरी|
CJI सूर्यकांत ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण के कार्यक्रम में कहा कि सुप्रीम कोर्ट पर्यावरण न्याय का बरगद है और विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण आवश्यक है।
नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम के दौरान सीजेआई सूर्यकांत सुप्रीम कोर्ट की पर्यावरण न्याय में भूमिका पर बात करते हुए नजर आ रहे हैं।
पर्यावरण और पारिस्थितिकी की सुरक्षा के मामले में न्यायपालिका की भूमिका पर बात करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने शनिवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरदर्शी बयान दिया है। उन्होंने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा आयोजित ‘पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता का भविष्य’ नामक कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट पर्यावरण न्याय का ‘बरगद का पेड़’ है। CJI ने इस बात पर जोर दिया कि देश में विकास और प्रकृति का संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों के बीच एक सही संतुलन का होना बेहद जरूरी है।
संबोधन के दौरान CJI सूर्यकांत ने विस्तार से बताया कि पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षा के लिए हमारे संविधान में कई प्रावधान पहले से मौजूद हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के शब्द केवल एक बीज की तरह होते हैं, जिन्हें अंकुरित होने और जीवन प्राप्त करने के लिए हमेशा न्यायिक समझ के पोषण की आवश्यकता होती है। सुप्रीम कोर्ट ने ठीक इसी जिम्मेदारी को निभाया है। शीर्ष अदालत पर्यावरण न्याय के ‘बरगद के पेड़’ की तरह मजबूती के साथ खड़ी रही है, जिसकी जड़ें भारत के प्राचीन सभ्यतागत मूल्यों में गहराई तक समाहित हैं और जिसकी फैली हुई शाखाएं देश की आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की पूरी सुरक्षा करती हैं।
अपने विचार रखते हुए CJI ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘संरक्षण के बिना प्रगति एक मृगतृष्णा है’, जो अंततः पारिस्थितिक विनाश के बंजर रेगिस्तान में कहीं गायब हो जाती है। अदालत के विभिन्न फैसलों में हमेशा इस बात को प्राथमिकता दी गई है कि प्रकृति की रक्षा करना केवल कोई साधारण परोपकार का कार्य नहीं है, बल्कि यह मानव जाति का आत्म-संरक्षण है। यह सीधे तौर पर जीवन की निरंतरता को बनाए रखने के लिए किया जाने वाला एक आवश्यक निवेश है।
न्यायपालिका के सक्रिय दृष्टिकोण का जिक्र करते हुए CJI ने बताया कि शीर्ष अदालत ने प्रदूषण मुक्त पर्यावरण के अधिकार को सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 के दायरे में शामिल किया है, जिससे यह नागरिकों का एक मौलिक अधिकार बन गया है। पर्यावरण से जुड़े न्यायिक दृष्टिकोण का यह सिलसिला लगातार आगे बढ़ा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने ‘पारिस्थितिकी-केंद्रित आनुपातिकता’ की अवधारणा को भी पूरी तरह से स्पष्ट किया है।
CJI ने समझाया कि ‘पारिस्थितिकी-केंद्रित आनुपातिकता’ का सीधा अर्थ यह है कि पर्यावरण संरक्षण के नियम मजबूत होने चाहिए, लेकिन साथ ही वे इतने विवेकपूर्ण भी होने चाहिए कि वे दुनिया के मौजूदा स्वरूप के साथ आसानी से तालमेल बिठा सकें। इस अवधारणा के तहत विकास कार्यों की अनुमति देने का सबसे व्यावहारिक तरीका यह है कि उसके साथ सख्त और लागू करने योग्य शर्तें जोड़ी जाएं, विशेषज्ञों की लगातार निगरानी हो, पर्यावरण की बहाली की जाए, क्षतिपूरक वनीकरण को बढ़ावा दिया जाए और हर स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
अपने संबोधन के अंत में CJI सूर्यकांत ने इस बात पर भी रोशनी डाली कि हालिया भारतीय जलवायु न्यायशास्त्र ने इस पूरे मुद्दे को संवैधानिक रूप से और अधिक गंभीर व महत्वपूर्ण बना दिया है। यह न्यायशास्त्र इस बात को स्वीकार करता है कि जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव समानता, आजीविका और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मौलिक अधिकारों को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकते हैं। इसके साथ ही, यह उन सभी आवश्यक परिस्थितियों को भी प्रभावित कर सकता है जो इन अधिकारों का एक सार्थक रूप से आनंद लेने के लिए बेहद जरूरी होती हैं।