मंदिरों का सोना बेचने के दावों पर वित्त मंत्रालय का स्पष्टीकरण, सोशल मीडिया की खबरों को बताया भ्रामक
सोशल मीडिया पर मंदिर ट्रस्टों के सोने को रणनीतिक रिजर्व घोषित करने और गोल्ड बॉन्ड जारी करने के दावों को सरकार ने पूरी तरह निराधार बताया।
नई दिल्ली के एक आभूषण शोरूम में रखे पारंपरिक भारतीय सोने के हार और गहनों का संग्रह|
पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध और वैश्विक आर्थिक संकट के बीच देश के स्वर्ण भंडार को लेकर चल रही अटकलों पर केंद्र सरकार ने अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। सोशल मीडिया और कतिपय मीडिया मंचों पर प्रसारित उन दावों को केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने सिरे से खारिज कर दिया है, जिनमें कहा जा रहा था कि सरकार देश के विभिन्न मंदिर ट्स्टों और धार्मिक संस्थानों के पास सुरक्षित सोने को बेचने या उनके बदले गोल्ड बॉन्ड जारी करने की किसी योजना पर काम कर रही है। वित्त मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान जारी कर इन सभी सूचनाओं को पूरी तरह फर्जी, निराधार और आम जनता को गुमराह करने वाला करार दिया है। इस स्पष्टीकरण का उद्देश्य उस आर्थिक और सामाजिक अनिश्चितता को समाप्त करना है, जो पिछले कुछ दिनों से देश के विभिन्न हिस्सों में चर्चा का विषय बनी हुई थी।
विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय परिवारों और धार्मिक संस्थानों के पास अनुमानित रूप से कुल 50,000 टन सोना संचित है, जिसकी वर्तमान वैश्विक बाजार में कुल कीमत लगभग 10,000 अरब डॉलर आंकी गई है। इस विशाल संपदा को लेकर इंटरनेट मीडिया पर लगातार यह भ्रामक सूचना प्रसारित की जा रही थी कि सरकार ने मंदिरों में रखे सोने के अनिवार्य मुद्रीकरण से संबंधित एक नए वित्तीय प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इन दावों में यह भी प्रचारित किया जा रहा था कि सरकार मंदिरों के ऐतिहासिक स्तंभों, मुख्य दरवाजों और अन्य पवित्र ढांचों पर मढ़े गए सोने को अधिग्रहित कर उन्हें आधिकारिक रूप से देश का रणनीतिक स्वर्ण भंडार घोषित करने जा रही है। वित्त मंत्रालय ने इन सभी दावों पर पूर्ण विराम लगाते हुए स्पष्ट किया है कि सरकार की ऐसी कोई मंशा या योजना नहीं है।
इस संवेदनशील विषय की गंभीरता को देखते हुए वित्त मंत्रालय ने देश के नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी प्रकार की अपुष्ट और मनगढ़ंत अफवाहों पर बिल्कुल ध्यान न दें। सरकार के अनुसार, ऐसी निराधार खबरें न केवल देश के वित्तीय बाजार को प्रभावित करती हैं बल्कि आम जनमानस में अनावश्यक भ्रम और अविश्वास की स्थिति भी उत्पन्न करती हैं। केंद्रीय मंत्रालय ने स्पष्ट कानूनी और प्रशासनिक नियामक प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार द्वारा नीतिगत स्तर पर लिया गया कोई भी निर्णय या लागू की जाने वाली वित्तीय योजना हमेशा आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति, निर्धारित सरकारी वेबसाइटों और सत्यापित सार्वजनिक संचार माध्यमों के जरिए ही देश के समक्ष प्रस्तुत की जाती है।
इस पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में देश के आर्थिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाए रखने के लिए की गई एक राष्ट्रव्यापी अपील भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। ईरान युद्ध के चलते वैश्विक अर्थव्यवस्था में आए व्यवधान के मद्देनजर प्रधानमंत्री ने देशवासियों से देशहित में कुछ कड़े वित्तीय अनुशासनों का पालन करने का आग्रह किया था। इस अपील के तहत उन्होंने नागरिकों से पेट्रोल, डीजल और खाद्य तेलों की दैनिक खपत को सीमित करने, रासायनिक खादों का प्रयोग घटाने और अकारण की जाने वाली विदेशी यात्राओं से परहेज करने के लिए कहा था। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से भारतीय नागरिकों से आगामी एक वर्ष तक सोने की नई खरीदारी से पूरी तरह बचने का अनुरोध किया था, ताकि देश की अमूल्य विदेशी मुद्रा को सुरक्षित रखा जा सके।
भारत वर्तमान में अपनी घरेलू मांग की पूर्ति के लिए प्रतिवर्ष 700 टन से अधिक सोने का आयात करता है, जिससे देश के चालू खाते के घाटे पर अत्यधिक नकारात्मक दबाव पड़ता है। विदेशी मुद्रा भंडार से बड़े पैमाने पर डॉलर के बाहर जाने के कारण हाल के दिनों में भारतीय रुपये के मूल्य में भारी गिरावट देखी गई है, जिससे यह चालू वर्ष में एशियाई महाद्वीप की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल हो गया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रधानमंत्री की इस अपील का उद्देश्य केवल आयात को नियंत्रित कर घरेलू अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाना था, न कि धार्मिक संस्थानों की परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण करना। सरकार के इस त्वरित और स्पष्ट रुख से स्वर्ण बाजार और धार्मिक संस्थाओं से जुड़े हितधारकों के बीच बनी भ्रम की स्थिति पूरी तरह समाप्त हो गई है।