क्या आवारा कुत्तों के आतंक से मिलेगी मुक्ति? सुप्रीम कोर्ट के इस बड़े फैसले पर टिकी देश की निगाहें!

सर्वोच्च अदालत आवारा कुत्तों और डॉग बाइट की घटनाओं से जुड़ी याचिकाओं पर फैसला सुनाएगी, जिसमें सार्वजनिक सुरक्षा और हर्जाने को लेकर दिशा-निर्देश तय किए जाएंगे।

Update: 2026-05-19 05:49 GMT

आक्रामक और भौंकते हुए आवारा कुत्तों का झुंड खड़ा है।

भारत में बढ़ती डॉग बाइट की घटनाओं और सड़कों पर आवारा पशुओं के जमावड़े से उत्पन्न होने वाली जनहानि अब एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा का संकट बन चुकी है। देश की सर्वोच्च अदालत इस बेहद संवेदनशील और जनहित से जुड़े मुद्दे पर अपना अंतिम विधिक रुख स्पष्ट करने के लिए पूरी तरह तैयार है। सर्वोच्च न्यायालय आवारा कुत्तों से जुड़ी उन महत्वपूर्ण याचिकाओं पर फैसला सुनाने जा रहा है, जिनमें पूर्व में जारी अंतरिम न्यायिक आदेशों में संशोधन और व्यावहारिक बदलाव करने की पुरजोर मांग की गई थी। इस मामले ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है क्योंकि यह सीधे तौर पर नागरिकों के जीवन के अधिकार और सार्वजनिक स्थानों पर उनकी सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

न्यायिक प्रक्रिया के विवरण के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायाधीश न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायाधीश न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की विशेष खंडपीठ ने इस विषय पर एक लंबी और मैराथन सुनवाई पूरी की थी। अदालत ने मामले से जुड़े सभी पक्षों, जिनमें मुख्य याचिकाकर्ता, प्रतिवादी, डॉग बाइट के पीड़ित, पशु कल्याण के लिए काम करने वाले संगठन, भारतीय पशु कल्याण बोर्ड यानी एडब्ल्यूबीआई और भारत सरकार के शीर्ष विधि अधिकारी शामिल थे, की विस्तृत दलीलों को गंभीरता से सुना था। सभी पक्षों की मौखिक और लिखित दलीलें रिकॉर्ड पर लेने के बाद न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली इसी पीठ ने बीती उनतीस जनवरी को अपना न्यायिक फैसला सुरक्षित रख लिया था।

इस मामले का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई द्वारा प्रस्तुत की गई दलीलें हैं। खंडपीठ ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवारा पशुओं के कारण होने वाली भीषण सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के संदर्भ में एनएचएआई के अधिवक्ता की दलीलों को भी रिकॉर्ड पर लिया। इससे पहले न्यायालय ने नवंबर के अपने आदेश में प्राधिकरण को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए थे कि देश के सभी प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों से आवारा पशुओं को हटाने की तत्काल व्यवस्था की जाए और सड़कों के किनारे पुख्ता बाड़ लगाने का काम पूरा किया जाए ताकि कोई भी बेसहारा पशु अचानक तेज रफ्तार वाहनों के सामने न आ सके। एनएचएआई ने अदालत को इन निर्देशों के अनुपालन की प्रगति रिपोर्ट से अवगत कराया।

इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने देश में पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में आ रही सुस्ती पर भी कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने भारतीय पशु कल्याण बोर्ड को कड़े शब्दों में आदेश दिया था कि देश भर के विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों यानी एनजीओ द्वारा पशु आश्रय स्थलों के निर्माण या पशु जन्म नियंत्रण सुविधाओं के संचालन के लिए जो भी आवेदन लंबित पड़े हैं, उन पर तुरंत निर्णय लिया जाए। जब बोर्ड के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि न्यायिक आदेशों के बाद ऐसे आवेदनों की संख्या में अचानक भारी उछाल आया है, तो पीठ ने साफ तौर पर कहा कि आप आवेदनों की योग्यता के आधार पर उन्हें स्वीकार करें या अस्वीकार करें, लेकिन फाइलों को लटकाए बिना यह प्रक्रिया शीघ्रता से पूरी की जानी चाहिए।

कानूनी और प्रशासनिक इतिहास को देखें तो जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ मुख्य रूप से सात नवंबर के उस पुराने आदेश में संशोधन की मांग करने वाली याचिकाओं पर अपना अंतिम फैसला दे रही है, जिसमें स्थानीय निकायों और प्रशासनिक अधिकारियों को संस्थागत क्षेत्रों, रिहायशी इलाकों और सार्वजनिक सड़कों से आवारा कुत्तों को तुरंत हटाने का निर्देश दिया गया था। न्यायालय ने पूर्व की सुनवाइयों के दौरान बेहद सख्त रुख अपनाते हुए देश में पिछले पांच वर्षों से आवारा पशुओं के प्रबंधन से संबंधित स्थापित मानदंडों और नियमों के सही ढंग से लागू न होने पर गहरी चिंता व्यक्त की थी। प्रशासन की इसी ढिलाई का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।

अदालत ने इस मामले की विधिक गंभीरता को रेखांकित करते हुए पूर्व में यह भी स्पष्ट कर दिया था कि वे राज्यों को कुत्ते के काटने की घटनाओं के लिए पीड़ितों को भारी वित्तीय हर्जाना देने का आदेश देने पर विचार कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, ऐसी अप्रिय घटनाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वाले लोगों की जवाबदेही भी तय की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट का यह आगामी फैसला देश के नगर निगमों, राज्य सरकारों और पशु अधिकार संगठनों के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत का काम करेगा, जो यह तय करेगा कि जीव कारुणा और मानव सुरक्षा के बीच एक विधिक संतुलन कैसे कायम किया जाए।

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