नीट विवाद के बीच थलपति विजय की मांग, शिक्षा और संघवाद पर छिड़ी संवैधानिक बहस|

नीट विवाद के बीच टीवीके प्रमुख थलपति विजय द्वारा शिक्षा को राज्य सूची में लाने की मांग से देश में संवैधानिक और विधायी बहस तेज हो गई है।

Update: 2026-07-26 06:40 GMT

तराजू, संविधान की पुस्तक और छात्रों के दृश्य के साथ वैधानिक अधिकारों पर चर्चा को दर्शाती छवि|

तमिलनाडु में शिक्षा को पुनः राज्य सूची में शामिल करने की मांग ने एक बार फिर देश में केंद्र और राज्यों के विधायी अधिकारों को लेकर एक गहरी संवैधानिक बहस को जन्म दे दिया है। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा यानी नीट को लेकर चल रहे लगातार राजनीतिक विरोध और कानूनी गतिरोध के बीच, तमिलगा वेत्री कड़गम के प्रमुख थलपति विजय द्वारा उठाई गई इस मांग ने शासन प्रणाली और संघीय ढांचे के बुनियादी सिद्धांतों पर नए सिरे से विचार करने के लिए मजबूर किया है। पार्टी का स्पष्ट तर्क है कि शिक्षा, विशेष रूप से चिकित्सा शिक्षा, पर राज्यों का प्राथमिक और प्रत्यक्ष अधिकार होना नितांत आवश्यक है, ताकि प्रत्येक राज्य अपनी विशिष्ट सामाजिक संरचना, क्षेत्रीय आवश्यकताओं और शैक्षणिक परिस्थितियों के अनुरूप नीतियां बना सके। यह मांग केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर संविधान की सातवीं अनुसूची, अनुच्छेद 246, अनुच्छेद 254 और ऐतिहासिक 42वें संविधान संशोधन से जुड़े तमाम विधिक प्रावधानों के दायरे को केंद्र में ले आती है।

संविधान के प्रारंभिक दौर में शिक्षा मूल रूप से राज्य सूची का ही एक प्रमुख विषय हुआ करती थी, जिसके अंतर्गत देश के सभी राज्यों को स्कूल, उच्च शिक्षण संस्थान और समग्र शिक्षा नीति से जुड़े अधिकांश महत्वपूर्ण मामलों पर कानून बनाने का पूर्ण अधिकार प्राप्त था। लेकिन वर्ष 1976 में आपातकाल के दौरान लाए गए 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से शिक्षा को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची की प्रविष्टि 25 के अंतर्गत स्थानांतरित कर दिया गया। इस बड़े बदलाव के बाद केंद्र सरकार और राज्य सरकारों दोनों को ही शिक्षा के क्षेत्र में कानून बनाने का समानांतर अधिकार मिल गया, हालांकि उच्च शिक्षा के मानक तय करने, राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों के संचालन और तकनीकी शिक्षा से जुड़े विशिष्ट विषय पहले से ही संघ सूची की प्रविष्टि 63 से 66 के तहत केंद्र के विशेषाधिकार क्षेत्र में सुरक्षित बने रहे। स्वर्ण सिंह समिति की मुख्य सिफारिशों के आधार पर किए गए इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र स्तर पर शिक्षा की एकरूपता स्थापित करना था, लेकिन वर्तमान में यही संशोधन केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों के टकराव का सबसे बड़ा संवैधानिक आधार बन चुका है।

इस पूरे प्रशासनिक और कानूनी विवाद का मूल कारण संविधान का अनुच्छेद 246 है, जो स्पष्ट रूप से केंद्र, राज्य और समवर्ती सूची के विषयों पर विधायी शक्तियों का निर्धारण करता है। समवर्ती सूची में शामिल विषयों पर संसद और राज्य विधानमंडल दोनों ही अपने स्तर पर कानून बना सकते हैं, परंतु यदि दोनों के बनाए गए कानूनों में किसी प्रकार का सीधा टकराव या विरोधाभास उत्पन्न होता है, तो संविधान के अनुच्छेद 254 की उपधारा 1 के अनुसार केंद्रीय कानून ही प्रभावी और सर्वोपरि माना जाता है। हालांकि अनुच्छेद 254 की उपधारा 2 एक बेहद सीमित अपवाद का प्रावधान अवश्य करती है, जिसके तहत किसी राज्य विशेष द्वारा बनाया गया कानून यदि राष्ट्रपति की औपचारिक स्वीकृति प्राप्त कर लेता है, तो वह उस विशिष्ट राज्य की सीमा के भीतर लागू हो सकता है। इसके बावजूद भारतीय संसद के पास यह पूर्ण अधिकार सुरक्षित रहता है कि वह भविष्य में नया या व्यापक कानून बनाकर उस राज्य के कानून को निष्प्रभावी या निरस्त कर सकती है। यही एक प्रमुख कानूनी वजह है कि तमिलनाडु विधानसभा द्वारा नीट से छूट प्राप्त करने से संबंधित विधेयक पारित किए जाने के बावजूद उसे अपेक्षित कानूनी और व्यावहारिक प्रभाव नहीं मिल सका, क्योंकि अंतिम निर्णय हमेशा राष्ट्रपति की स्वीकृति और केंद्रीय कानूनों की स्थिति पर ही निर्भर करता है।

इन तमाम कानूनी पेचोखाम के बीच तमिलगा वेत्री कड़गम और थलपति विजय का यह भी सुझाव रहा है कि एक व्यावहारिक और अंतरिम समाधान के रूप में 'विशेष समवर्ती सूची' जैसी नई व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए, जिससे राज्यों को अपनी स्थानीय प्राथमिकताओं के अनुसार नीतिगत निर्णय लेने के लिए अधिक अधिकार मिल सकें। हालांकि मौजूदा भारतीय संविधान के पाठ में इस तरह की किसी विशेष समवर्ती सूची का कोई प्रत्यक्ष प्रावधान मौजूद नहीं है, और ऐसी किसी भी व्यवस्था को लागू करने के लिए भी एक लंबा और जटिल संवैधानिक संशोधन मार्ग अपनाना अनिवार्य होगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा को समवर्ती सूची से निकालकर दोबारा पूर्ण रूप से राज्य सूची में शामिल करना किसी भी लिहाज से एक आसान प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए सरकार को संविधान की सातवीं अनुसूची में संशोधन करना होगा, जो केवल अनुच्छेद 368 के तहत निर्धारित सख्त संवैधानिक संशोधन प्रक्रिया के माध्यम से ही संभव हो सकता है।

इस प्रकार की किसी भी बड़ी कानूनी पहल के तहत संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों में अपने निर्धारित विशेष बहुमत से पारित कराना अनिवार्य होगा, और चूंकि यह बदलाव सीधे तौर पर केंद्र और राज्यों के बीच विधायी और प्रशासनिक शक्तियों के संतुलन को प्रभावित करेगा, इसलिए देश के कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं से इस संशोधन की पुष्टि यानी रैटिफिकेशन प्राप्त करना भी कानूनी रूप से बेहद जरूरी होगा। कुल मिलाकर, तमिलनाडु की इस राजनीतिक और विधिक पहल ने एक बार फिर उस दशकों पुरानी और संवेदनशील संवैधानिक बहस को सतह पर ला दिया है, जिसमें संघवाद की भावना और राज्यों की स्वायत्तता का सवाल सबसे ऊपर खड़ा होता है। वर्तमान विधिक ढांचे के भीतर जहां शिक्षा समवर्ती सूची का एक ऐसा विषय है जहां केंद्रीय कानून को प्राथमिकता प्राप्त है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय आकांक्षाओं और स्थानीय प्रशासनिक जरूरतों का दबाव इस बात की मांग करता है कि नीतिगत मामलों में राज्यों की आवाज को भी पूरी महत्ता दी जाए। यदि भविष्य में शिक्षा के प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर कोई ठोस बदलाव करना है, तो उसका एकमात्र और अंतिम संवैधानिक मार्ग संसद और राज्यों के बीच व्यापक आम सहमति और विधायी संशोधन से ही होकर गुजर सकता है, जिसका भारतीय संघवाद के भविष्य पर दूरगामी प्रभाव पड़ना तय है।

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