भूमि अधिग्रहण पर दिल्ली हाई कोर्ट सख्त, कहा- फंड की कमी बताकर मुआवजा नहीं रोक सकती सरकार|
दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकार को अधिग्रहित जमीन का मुआवजा चार महीने के भीतर जारी करने का कड़ा निर्देश दिया है।
दिल्ली हाई कोर्ट का बाहरी परिसर, जहां अदालतों द्वारा सरकारी नीतियों और नागरिकों के अधिकारों पर अहम फैसले लिए जाते हैं।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल स्थापित करते हुए स्पष्ट किया है कि सरकारी एजेंसियां फंड की कमी का तर्क देकर भूमि अधिग्रहण के मुआवजे में अनिश्चितकाल तक देरी नहीं कर सकती हैं। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति विकास महाजन की खंडपीठ ने पूठ खुर्द में अधिग्रहित भूमि से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान यह कड़ा रुख अपनाया है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया था कि दिल्ली के नियोजित विकास के तहत 100 मीटर चौड़ी सड़क निर्माण हेतु उनकी भूमि का अधिग्रहण किया गया था, किंतु वर्षों बीत जाने के बाद भी उन्हें अपेक्षित मुआवजा प्राप्त नहीं हुआ है।
सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष द्वारा फंड की कमी को भुगतान में देरी का मुख्य कारण बताया गया। इस दलील को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने जोर दिया कि जब राज्य किसी नागरिक की निजी संपत्ति को सार्वजनिक परियोजना के उद्देश्य से अपने कब्जे में लेता है, तो समयबद्ध मुआवजा प्रदान करना सरकार का एक अनिवार्य कानूनी और संवैधानिक दायित्व बन जाता है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वित्तीय बाधाओं का बहाना बनाकर भूमि मालिकों को अंतहीन इंतजार के लिए मजबूर करना न्याय के सिद्धांतों के प्रतिकूल है। इस संदर्भ में, न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे मुआवजा भुगतान के संबंध में आवश्यक निर्णय अगले चार महीनों के भीतर सुनिश्चित करें।
यह न्यायिक आदेश उन हजारों भूमि मालिकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो सरकारी परियोजनाओं के लिए भूमि सौंपने के बाद भी वर्षों से मुआवजे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उच्च न्यायालय का यह फैसला न केवल प्रभावित नागरिकों को राहत प्रदान करता है, बल्कि सरकारी तंत्र में जवाबदेही की संस्कृति को भी बढ़ावा देता है। अदालत ने यह संदेश दिया है कि लोक कल्याणकारी परियोजनाओं की आड़ में नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन स्वीकार्य नहीं है और प्रशासनिक शिथिलता को कानूनी वैधता नहीं दी जा सकती।
न्यायपालिका के इस दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि विकास के कार्यों में वित्तीय प्रबंधन और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है। फंड की कमी को एक प्रशासनिक चुनौती माना जा सकता है, किंतु इसे मुआवजे के भुगतान में विलंब के लिए एक वैध आधार के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय के इस निर्देश से सरकारी एजेंसियों को अपनी वित्तीय प्राथमिकताओं को फिर से निर्धारित करने और अधिग्रहित भूमि के बदले समय पर भुगतान सुनिश्चित करने की आवश्यकता होगी। यह निर्णय न केवल मौजूदा मामले में एक समाधान प्रदान करेगा, बल्कि भविष्य में भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवादों के त्वरित निपटान के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में भी कार्य करेगा।