दिवाली एलईडी झालर: जानिए कैसे काम करती है टिमटिमाती लाइट की तकनीक
चेजर सर्किट और माइक्रोचिप कैसे AC बिजली को DC में बदलकर झालर को अलग-अलग पैटर्न में चमकाते हैं, जानिए इसकी पूरी तकनीकी जानकारी।
दिवाली सजावट के लिए उपयोग की जाने वाली एलईडी झालर और उसकी इलेक्ट्रॉनिक कार्यप्रणाली को दर्शाती तस्वीर।
दिवाली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों से लेकर घरों तक सजावट की तैयारियां शुरू हो गई हैं। घरों की छतों, बालकनी और दरवाजों पर लगाई जाने वाली रंग-बिरंगी एलईडी झालरें इस सजावट का प्रमुख हिस्सा होती हैं। शाम होते ही जब ये लाइटें जगमगाने लगती हैं, तो कभी तेजी से चमकती हैं, कभी धीरे-धीरे मद्धम पड़ती हैं और कभी पानी की लहरों की तरह दौड़ती हुई दिखाई देती हैं। कई झालरें संगीत की धुन पर भी रोशनी के अलग-अलग पैटर्न बनाती हैं। लेकिन इन छोटे-छोटे एलईडी बल्बों को कब और किस तरह जलना-बुझना है, इसका निर्देश आखिर कौन देता है? इसके पीछे एक खास इलेक्ट्रॉनिक तकनीक काम करती है।
दिवाली का काउंटडाउन शुरू हो चुका है और बाजारों से लेकर घरों तक त्योहारी रौनक छाने लगी है। साफ-सफाई के बाद अब घरों को सजाने की तैयारियां हो रही हैं। इस सजावट में रंग-बिरंगी टिमटिमाती झालरों की अहम भूमिका रहती है। आमतौर पर लोग इन झालरों को बिजली के प्लग में लगाकर छोड़ देते हैं, लेकिन इनके अलग-अलग रोशनी वाले पैटर्न के पीछे एक छोटी इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था काम करती है।
छोटी सी डिब्बी में छिपा होता है झालर का दिमाग
अगर किसी एलईडी झालर को ध्यान से देखा जाए, तो उसके प्लग के ठीक पास एक छोटी प्लास्टिक की डिब्बी लगी दिखाई देती है। इस पर एक बटन भी होता है। दरअसल, यही डिब्बी पूरी झालर को नियंत्रित करती है। तकनीकी भाषा में इसे चेजर सर्किट या कंट्रोलर कहा जाता है। इसके अंदर प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) और एक छोटी माइक्रोचिप लगी होती है।
घरों में आने वाली बिजली AC यानी ऑल्टरनेटिंग करंट होती है, जबकि झालर में लगे एलईडी बल्ब DC यानी डायरेक्ट करंट पर काम करते हैं। कंट्रोलर का स्मार्ट बॉक्स AC बिजली को DC में बदलने का काम करता है। इसके साथ ही बॉक्स में मौजूद चिप में चेजिंग, फ्लैशिंग और ट्विंकलिंग जैसे रोशनी के अलग-अलग पैटर्न पहले से कोड किए होते हैं। यह चिप बिजली के प्रवाह को नियंत्रित तरीके से रोकती और चालू करती है, जिससे झालर कभी टिमटिमाती तो कभी तेजी से चमकती हुई दिखाई देती है।
खास वायरिंग से बनता है दौड़ती रोशनी का पैटर्न
एलईडी झालर में केवल एक तार नहीं होता, बल्कि तीन या चार तारों का गुच्छा आपस में जुड़ा रहता है। इसमें सभी बल्ब एक ही लाइन में नहीं लगाए जाते, बल्कि उन्हें अलग-अलग समूहों यानी चैनल्स में बांटा जाता है। उदाहरण के तौर पर, पहला, चौथा और सातवां बल्ब एक तार से जुड़े हो सकते हैं, जबकि दूसरा, पांचवां और आठवां बल्ब दूसरे तार से जुड़े होते हैं।
इस व्यवस्था को सीरीज और पैरेलल कनेक्शन का मिश्रण कहा जाता है। जब माइक्रोचिप पहले तार में करंट भेजती है और दूसरे तार में बिजली का प्रवाह रोक देती है, तो कुछ लाइटें जलती हैं और बाकी बुझ जाती हैं। इसके बाद यही प्रक्रिया पलक झपकते ही बार-बार दोहराई जाती है। इस तेजी से होने वाले बदलाव के कारण आंखों को ऐसा दिखाई देता है, मानो रोशनी एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर दौड़ रही हो।
इस खास वायरिंग का एक अन्य फायदा भी है। अगर झालर के बीच में लगा कोई एक बल्ब फ्यूज हो जाता है, तब भी पूरी झालर बंद होने से बच सकती है।
पुरानी झालरों में बाई-मेटैलिक स्ट्रिप करती थी काम
पहले के समय में ऐसी झालरें भी उपलब्ध थीं, जिनमें कंट्रोलर की छोटी डिब्बी नहीं होती थी। इनमें एक विशेष मास्टर बल्ब लगाया जाता था। इस बल्ब के अंदर बाई-मेटैलिक स्ट्रिप होती थी, जो गर्म होने पर मुड़ जाती थी। इससे बिजली का कनेक्शन कट जाता और लाइट बुझ जाती थी। स्ट्रिप ठंडी होने पर दोबारा अपनी स्थिति में लौटती और बिजली का कनेक्शन जुड़ने से रोशनी फिर चालू हो जाती थी। हालांकि, अब इस तरह की व्यवस्था काफी पुरानी हो चुकी है।
अब स्मार्टफोन से नियंत्रित हो रही हैं दिवाली की झालरें
तकनीक के विकास के साथ अब बाजार में पिक्सल एलईडी (Pixel LED) और स्मार्ट लाइट्स का इस्तेमाल बढ़ा है। इन लाइटों की खासियत यह है कि प्रत्येक एलईडी बल्ब के अंदर अपनी अलग माइक्रोचिप होती है। ये लाइटें वाई-फाई और ब्लूटूथ के माध्यम से स्मार्टफोन के एप से कनेक्ट हो सकती हैं।
इसके बाद उपयोगकर्ता अपने मोबाइल फोन पर अपनी पसंद का गाना चला सकते हैं और झालरें उसी संगीत की बीट के अनुसार रोशनी के पैटर्न बदलने लगती हैं। इस तरह साधारण टिमटिमाती झालरों से लेकर संगीत की धुन पर चलने वाली स्मार्ट लाइट्स तक, दिवाली की सजावट में इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोलर, माइक्रोचिप और कनेक्टिविटी तकनीक की अहम भूमिका है।