तिल की फसल पर फाइलोईडी रोग का खतरा बढ़ा, समय पर पहचान और लीफहॉपर नियंत्रण जरूरी
सवाई माधोपुर में तिल की फसल पर फाइलोईडी रोग का खतरा बढ़ा। जानिए लक्षण, लीफहॉपर नियंत्रण और फसल बचाने के जरूरी उपाय।
तस्वीर में तिल के पौधों की हरी पत्तियां और पत्तीनुमा विकसित होते फूल दिखाई दे रहे हैं।
खरीफ मौसम में तिल की फसल में फाइलोईडी रोग का प्रकोप किसानों के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। प्रारंभिक अवस्था में रोग की पहचान कर समय पर नियंत्रण नहीं किया गया तो पूरी फसल प्रभावित हो सकती है और उपज में 30 से 100 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। कृषि विभाग ने किसानों से फसल की नियमित निगरानी करने और रोग के लक्षण दिखाई देते ही वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन अपनाने की अपील की है।
सहायक कृषि अधिकारी पिन्टू मीना पहाड़ी ने बताया कि फाइलोईडी रोग फाइटोप्लाज्मा नामक सूक्ष्म जीवाणु सदृश रोगजनक के कारण होता है, जो पौधों की फ्लोएम नलिकाओं में निवास करता है। यह रोग बीज के माध्यम से नहीं फैलता, बल्कि मुख्य रूप से लीफहॉपर (जैसिड) जैसे रस चूसने वाले कीट के माध्यम से एक पौधे से दूसरे पौधे में पहुंचता है। संक्रमित पौधों का रस चूसने के बाद यही कीट स्वस्थ पौधों में रोग का संक्रमण फैला देता है, जिससे धीरे-धीरे पूरे खेत में रोग का प्रकोप बढ़ सकता है।
सहायक निदेशक कृषि सियराम मीना ने बताया कि फाइलोईडी रोग से प्रभावित पौधों में सबसे पहले फूल अपनी सामान्य संरचना खोकर हरे पत्तों जैसे दिखाई देने लगते हैं। पौधों में अत्यधिक शाखाएं निकलने से वे झाड़ी जैसे दिखाई देते हैं। संक्रमित पौधों में फलियां नहीं बनतीं अथवा बहुत कम बनती हैं, जिससे बीज उत्पादन लगभग समाप्त हो जाता है। कई बार ऐसे पौधे लंबे समय तक हरे दिखाई देते हैं, लेकिन उनमें आर्थिक उपज नहीं मिलती। यदि फसल की प्रारंभिक अवस्था में संक्रमण हो जाए तो किसान को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
पिन्टू मीना पहाड़ी ने बताया कि इस रोग का कोई प्रत्यक्ष उपचार उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसकी रोकथाम ही सबसे प्रभावी उपाय है। खेत में रोगग्रस्त पौधे दिखाई देते ही उन्हें जड़ सहित उखाड़कर खेत से बाहर नष्ट कर देना चाहिए, ताकि संक्रमण आगे न फैले। खेत और मेड़ों पर उगने वाले खरपतवारों को नियमित रूप से हटाना भी आवश्यक है, क्योंकि ये लीफहॉपर कीट के आश्रय स्थल बनकर रोग के प्रसार में सहायक होते हैं। किसानों को प्रत्येक पांच से सात दिन के अंतराल पर फसल का निरीक्षण करने की सलाह दी गई है।
उन्होंने बताया कि चूंकि रोग का प्रसार लीफहॉपर (जैसिड) द्वारा होता है, इसलिए इसके नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। लीफहॉपर की संख्या बढ़ने पर कृषि वैज्ञानिकों की अनुशंसा के अनुसार इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल का 0.3 मिली प्रति लीटर पानी, थायमेथोक्साम 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी का 0.25 ग्राम प्रति लीटर पानी, एसिटामिप्रिड 20 प्रतिशत एसपी का 0.2 ग्राम प्रति लीटर पानी अथवा डाइनोटेफ्यूरान 20 प्रतिशत एसजी का 0.3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव किया जा सकता है। आवश्यकता पड़ने पर 10 से 15 दिन के अंतराल पर दोबारा छिड़काव भी किया जा सकता है। कीटनाशकों का प्रयोग हमेशा अनुशंसित मात्रा में तथा कृषि विभाग के मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए। छिड़काव के दौरान मौसम साफ रहना चाहिए।
लखपत लाल मीना, संयुक्त निदेशक कृषि, सवाई माधोपुर ने किसानों से संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाने, अनावश्यक नाइट्रोजन उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से बचने और खेत को खरपतवार मुक्त रखने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि नियमित निगरानी, संक्रमित पौधों का तत्काल निष्कासन तथा वाहक कीट का समय पर नियंत्रण ही फाइलोईडी रोग से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।
कृषि विभाग ने क्षेत्र के तिल उत्पादक किसानों से अपील की है कि फसल में फूलों के पत्तीनुमा दिखाई देने, अत्यधिक शाखाएं बनने अथवा फलियां नहीं बनने जैसे लक्षण दिखाई देने पर इसे सामान्य समस्या न समझें। ऐसी स्थिति में तुरंत निकटतम कृषि अधिकारी या कृषि पर्यवेक्षक से संपर्क कर वैज्ञानिक सलाह के अनुसार आवश्यक प्रबंधन अपनाएं। समय पर की गई सावधानी और वैज्ञानिक उपाय किसानों को भारी आर्थिक नुकसान से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।