मुक्ति पर्व पर सतगुरु सुदीक्षा जी महाराज का संदेश, मन के बंधनों से आजादी ही वास्तविक मुक्ति
मुक्ति पर्व पर सतगुरु सुदीक्षा जी महाराज ने मन के बंधनों से मुक्ति को वास्तविक आजादी बताया, गंगापुर सिटी में भी समागम आयोजित हुआ।
तस्वीर में सफेद वस्त्र पहने वक्ता माइक्रोफोन से संबोधित करते हुए दिख रहे हैं, जबकि सामने महिला और पुरुष श्रोता सभागार में बैठे हैं।
संपूर्ण भारतवर्ष में स्वतंत्रता दिवस राष्ट्रभक्ति, गौरव और उल्लास के साथ मनाया गया, वहीं संत निरंकारी मिशन ने इस ऐतिहासिक अवसर पर ब्रह्मज्ञान से प्राप्त आंतरिक स्वतंत्रता के दिव्य संदेश को जन-जन तक पहुंचाया। इसी क्रम में मुक्ति पर्व का पावन आयोजन परम श्रद्धेय सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता रमित जी के पावन सान्निध्य में दिल्ली स्थित निरंकारी सरोवर के समक्ष, ग्राउंड नं. 2, निरंकारी चौक, बुराड़ी रोड पर श्रद्धा, भक्ति और उल्लासपूर्ण वातावरण में हुआ।
विदेशों की विस्तृत कल्याणकारी प्रचार यात्रा के सफल समापन के लम्बे अंतराल के उपरांत सतगुरु के पावन दर्शन प्राप्त कर हजारों श्रद्धालु भक्त भाव विभोर हो उठे। आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने कहा कि सच्ची मुक्ति बाहरी बंधनों से नहीं, बल्कि नफरत, अहंकार, छोटी सोच और पूर्वाग्रहों से मुक्त होने में है। हर सांस में निराकार का एहसास रखते हुए प्रेम, भक्ति और स्वीकार्यता के साथ जीना ही जीते-जी मुक्ति है।
इसी क्रम में गंगापुर सिटी में 15 अगस्त को भगवती पैलेस में भी मुखी बहन पुष्पा रानी जी की देखरेख में मुक्ति पर्व समागम आयोजित किया गया। कोटा से आए जितेंद्र रावल जी ने सतगुरु का अमर संदेश देते हुए कहा कि इंसान मोह-माया, क्रोध, लोभ, अहंकार और भ्रम के बंधनों से मुक्त होकर ही सच्ची मुक्ति प्राप्त कर सकता है। सतगुरु द्वारा दिए ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर यह आत्मा आवागमन के चक्कर से मुक्त होकर परमात्मा को प्राप्त कर मुक्त होती है।
सतगुरु माताजी ने माता सविंदर जी के जीवन से प्रेरणा देते हुए लाइट हाउस का उदाहरण दिया और संदेश दिया कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, भीतर की शांति, प्रेम और सकारात्मकता की रोशनी सदैव कायम रखनी चाहिए।
इस पावन दिवस को उन सभी अनन्य भक्तों एवं समर्पित सेवादारों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा अर्पित करने का अवसर भी बनाया गया, जिन्होंने अपने तन, मन और जीवन को निस्वार्थ भाव से मिशन एवं मानवता की सेवा में समर्पित किया। मुक्ति पर्व का मूल भाव यही रहा कि जैसे भौतिक स्वतंत्रता राष्ट्र की प्रगति और उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान की दिव्य ज्योति मानव को अपनी वास्तविक पहचान का बोध कराते हुए प्रेम एवं सद्भाव के पावन मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान करती है।