देवयानी ने हिंदी साहित्य में रचा नया अध्याय, शास्त्रीय महाकाव्य की परंपरा में महिला लेखनी का दावा
डॉ. मधु चतुर्वेदी की ‘देवयानी’ हिंदी में महिला रचनाकार के शास्त्रीय महाकाव्य की ऐतिहासिक परंपरा पर नया विमर्श सामने लाती है।
तस्वीर में डॉ. मधु चतुर्वेदी कृत 'देवयानी' पुस्तक का आवरण पृष्ठ नजर आ रहा है।
डॉ. मधु चतुर्वेदी कृत ‘देवयानी’ (2025) को हिंदी साहित्य के हजार वर्षीय इतिहास में एक ऐसी कृति के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो महाकाव्य की परंपरा में महिला रचनाकार की उपस्थिति को नए संदर्भ में सामने लाती है। यह कृति केवल काव्य-रचना नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक रिक्तता को भरने का प्रयास बताई गई है, जिसमें किसी महिला रचनाकार द्वारा रचित शुद्ध पद्यबद्ध शास्त्रीय महाकाव्य का उल्लेख नहीं मिलता।
नागरी प्रचारिणी सभा के अभिलेखों से लेकर साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ के समग्र इतिहास तक फैली सहस्र-वर्षीय साहित्यिक परंपरा में पद्मावत, रामचरितमानस, साकेत, कामायनी और उर्वशी जैसी महाकाव्यात्मक कृतियों की गौरवशाली धारा रही है। इस परंपरा में महिला रचनाकारों ने गीत, मुक्तक और खंडकाव्य लिखे, लेकिन महाकाव्य के विस्तृत फलक, कठोर शास्त्रीय अनुशासन और सर्गबद्ध संरचना के स्तर पर किसी महिला रचनाकार की कृति को स्थान नहीं मिला।
इसी संदर्भ में ‘देवयानी’ यह प्रश्न उठाती है कि क्या महिला लेखनी केवल कोमल अनुभूतियों तक सीमित है और क्या वह महाकाव्य के लिए अपेक्षित कठोर अनुशासन, व्यापक फलक तथा शास्त्रीय मर्यादा को साध सकती है। कृति को इन प्रश्नों का सकारात्मक प्रत्युत्तर बताया गया है।
भारतीय साहित्य में 14वीं शताब्दी की विजयनगर साम्राज्य की महारानी और विदुषी कवयित्री गंगादेवी का उदाहरण भी सामने रखा गया है। उन्होंने ‘मदुरा विजयम् या वीरकंपराय चरितम्’ नामक पूर्ण और प्रामाणिक शास्त्रीय महाकाव्य की रचना संस्कृत में वैदर्भी रीति और कठोर शास्त्रीय नियमों के अनुशासन में की थी। ‘देवयानी’ के संदर्भ में इसी उदाहरण को आधार बनाते हुए यह सवाल उठाया गया है कि यदि 600 वर्ष पूर्व एक भारतीय नारी संस्कृत में शास्त्रीय महाकाव्य की रचना कर सकती थी, तो आज हिंदी में क्यों नहीं। इसी संकल्प से ‘देवयानी’ के जन्म की बात कही गई है।
‘देवयानी’ के कथानक के लिए महाभारत के आदिपर्व की देवयानी, ययाति और शर्मिष्ठा की कथा को आधार बनाया गया है। इसे केवल प्रेम-त्रिकोण के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि स्वाभिमान और समर्पण, इच्छा और त्याग तथा भौतिकता और आध्यात्मिकता के शाश्वत द्वंद्व की कथा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। देवयानी को केवल पौराणिक पात्र न मानकर आधुनिक नारी के स्वाभिमान की प्रतीक के रूप में देखा गया है, जो प्रेम करती है तो पूर्णता से और अपमानित होने पर प्रतिकार भी करती है। युगीन सत्य को आधार बनाकर इस कथा को आधुनिक बोध से जोड़ना कृति का उद्देश्य बताया गया है।
आधुनिक काल में महाकाव्य के नाम पर विधागत शिथिलता बढ़ने की बात भी इस संदर्भ में कही गई है। ‘पृथ्वीराज रासो’ को रामचंद्र शुक्ल आदि ने हिंदी का प्रथम महाकाव्य माना, लेकिन उसकी प्रामाणिकता और महाकाव्यत्व अकादमिक विवादों में रहे हैं। ‘साकेत’ मूलतः उर्मिला के विरह पर केंद्रित खंडकाव्यात्मक संवेदना है, ‘कामायनी’ शुद्ध शास्त्रीय महाकाव्य न होकर मनोवैज्ञानिक रूपक काव्य है और ‘रामचंद्रिका’ के संदर्भ में आलोचकों ने उसकी महाकाव्योचित प्रबंधात्मकता के अभाव को रेखांकित किया है।
‘देवयानी’ की लेखिका ने इस कथित भटकाव से बचने का प्रयास किया है। कृति में आचार्य भामह, दण्डी और विश्वनाथ द्वारा प्रतिपादित महाकाव्य के शास्त्रीय सिद्धांतों के अनुरूप सर्गबद्धता, उदात्त कथानक, मंगलाचरण, रस-योजना, युगीन संघर्ष और धीरोदात्त चरित्र के निर्वाह का यत्न किया गया है। वीर, शृंगार और शांत रसों की योजना के साथ देवयानी को स्वाभिमानी नारी-चेतना के केंद्र में रखा गया है।
हिंदी साहित्य के क्रमिक इतिहास को 8वीं-10वीं शताब्दी से माना जाता है। प्रस्तुत आलेख में कहा गया है कि नागरी प्रचारिणी सभा, साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ के समस्त अभिलेखों में आधुनिक काल तक किसी महिला रचनाकार द्वारा रचित ‘शुद्ध पद्यबद्ध शास्त्रीय महाकाव्य’ को मान्यता नहीं मिली। महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी कवयित्रियों ने प्रबंध काव्य, खंडकाव्य और लंबी कविताएं लिखीं, लेकिन महाकाव्य के विस्तृत फलक, उदात्त नायकत्व और सर्गबद्धता के कठोर मानदंडों पर कोई ऐतिहासिक ग्रंथ उपलब्ध नहीं था।
भारतीय भाषाओं के परिप्रेक्ष्य में भी इस उपलब्धि को महत्वपूर्ण बताया गया है। संस्कृत में 14वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य की महारानी कवयित्री गंगादेवी ने ‘मदुरा विजयम्’ नामक पूर्ण शास्त्रीय महाकाव्य की रचना की थी, जो वैदर्भी रीति और कठोर अनुशासन में लिखा गया था। संस्कृत के बाद तमिल में ‘सिलप्पादिकरम्’, ‘मणिमेखलै’ से लेकर हिंदी में ‘पद्मावत’, ‘रामचरितमानस’, ‘प्रियप्रवास’, ‘साकेत’, ‘कामायनी’ और ‘उर्वशी’ तक लगभग सभी शास्त्रीय महाकाव्य पुरुष लेखनी से निकले हैं। गंगादेवी के 600 वर्ष बाद डॉ. मधु चतुर्वेदी द्वारा हिंदी में इसी ऐतिहासिक कार्य को दोहराने का दावा किया गया है।
कृति की शास्त्रीयता के संदर्भ में इसकी मूल कथा महाभारत के आदिपर्व से प्रेरित देवयानी, ययाति और शर्मिष्ठा के त्रिकोणीय संघर्ष पर आधारित है। इसके केंद्र में देवयानी का स्वाभिमान, इच्छा बनाम त्याग और युगीन सत्य का द्वंद्व है। सुसंगठित सर्ग योजना, उदात्त कथानक, धीरोदात्त नायिका, मंगलाचरण, शृंगार, वीर और शांत रसों की योजना तथा युगीन संघर्ष के निर्वाह को इसकी प्रमुख शास्त्रीय विशेषताओं के रूप में रेखांकित किया गया है।
हिंदी महाकाव्य परंपरा के पुनर्विचार में ‘साकेत’, ‘कामायनी’ और ‘रामचंद्रिका’ को भी अलग-अलग दृष्टि से देखा गया है। ‘साकेत’ को उर्मिला के विरह पर केंद्रित खंडकाव्यात्मक संवेदना वाला बताया गया है, ‘कामायनी’ को महान छायावादी कृति होते हुए भी मनोवैज्ञानिक रूपक काव्य कहा गया है, जबकि ‘रामचंद्रिका’ के बारे में महाकाव्योचित प्रबंधात्मकता के अभाव की बात कही गई है। इसके विपरीत ‘देवयानी’ को महाकाव्य के शास्त्रीय ढांचे पर पूरी तरह खरी उतरने वाली कृति के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
इस दृष्टि से ‘देवयानी’ को केवल काव्य-पुस्तक नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य में महिला रचनाकार की शास्त्रीय महाकाव्य रचना की संभावनाओं से जुड़ी सांस्कृतिक घोषणा के रूप में देखा गया है। कृति के माध्यम से यह स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि महिला रचनाकार गीत और मुक्तक की कोमल अनुभूतियों के साथ-साथ महाकाव्य जैसे कठोर, वृहद और शास्त्रीय अनुशासन वाले साहित्यिक रूप को भी साध सकती है। इस प्रकार ‘देवयानी’ को हिंदी आलोचना जगत में लंबे समय से उठते रहे उस प्रश्न के प्रत्युत्तर के रूप में प्रस्तुत किया गया है कि क्या हिंदी में कोई महिला शास्त्रीय महाकाव्य रच सकती है। लेख के अनुसार, ‘देवयानी’ के रूप में इस प्रश्न का उत्तर सामने आया है।