हिण्डौन सिटी: पर्युषण पर्व के दूसरे दिन क्षमापना व 5 कर्तव्यों पर व्याख्यान
गुजरात के बाल आराधक विहान ने अहिंसा, अट्ठम तप, साधर्मिक वात्सल्य, क्षमापना और चैत्य परिपाटी के आध्यात्मिक महत्व की जानकारी दी।
तस्वीर में हिण्डौन सिटी में आयोजित धार्मिक व्याख्यान के दौरान सफेद वस्त्रों में तीन आराधक बैठे दिखाई दे रहे हैं।
हिण्डौन सिटी। पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के दूसरे दिवस धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण में क्षमापना विषय पर विशेष व्याख्यान हुआ। गुजरात से आराधना करने आए बाल आराधक भाई विहान ने क्षमापना के आध्यात्मिक महत्व के साथ पर्युषण महापर्व के पांच कर्तव्यों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पर्युषण आत्मावलोकन, संयम और आत्मशुद्धि का पर्व है तथा परस्पर क्षमापना इसका महत्वपूर्ण अंग है।
भाई विहान ने कहा कि मनुष्य को सभी से क्षमा मांगनी चाहिए और दूसरों को भी हृदय से क्षमा करना चाहिए। क्षमा के माध्यम से मन में जमे वैर, क्रोध और कटुता को दूर कर आत्मा को निर्मल बनाने का प्रयास किया जाता है। व्याख्यान में पर्युषण के पांच कर्तव्यों को सरलता से समझाते हुए उनके धार्मिक महत्व पर प्रकाश डाला गया।
उन्होंने बताया कि अमारि प्रवर्तन यानी अहिंसा के अंतर्गत सभी प्राणियों के प्रति दया और करुणा का भाव रखना चाहिए। अहिंसा केवल बाहरी रूप से जीवों को कष्ट नहीं पहुंचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी आत्मा में जमे कषायों को समाप्त करने का भी प्रयास करना चाहिए। साधर्मिक वात्सल्य के माध्यम से अहिंसा धर्म का पालन करने वाले साधर्मिकों के प्रति प्रेम, वात्सल्य एवं सहयोग का भाव रखते हुए उनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने का प्रयास करने का संदेश दिया गया।
अट्ठम तप के अंतर्गत कम से कम एक बार लगातार तीन उपवास करने की तपस्या का विधान बताया गया। तप के माध्यम से शरीर के साथ मन एवं आत्मा पर संयम स्थापित करने का संदेश दिया गया। परस्पर क्षमापना यानी क्षमा याचना में सभी से अपने जाने-अनजाने हुए अपराधों के लिए क्षमा मांगने और सभी को हृदय से क्षमा करने की भावना रखने पर जोर दिया गया।
वहीं चैत्य परिपाटी के अंतर्गत श्रीसंघ के साथ सामूहिक रूप से नगर के सभी जिनमंदिरों में दर्शन करने की परंपरा एवं उसके धार्मिक महत्व के बारे में बताया गया। भाई विहान ने कहा कि पर्युषण के पांचों कर्तव्य व्यक्ति को अहिंसा, भक्ति, तप, क्षमा और जिनभक्ति के माध्यम से आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाते हैं। इनका उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाओं का पालन करना नहीं, बल्कि जीवन में संयम, करुणा, त्याग और क्षमाभाव को उतारना है।
व्याख्यान के दौरान बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने धर्मलाभ लिया। पूरे वातावरण में भक्ति एवं आध्यात्मिकता का भाव दिखाई दिया। श्रद्धालुओं ने पर्युषण महापर्व के दौरान पांचों कर्तव्यों को श्रद्धा एवं निष्ठा के साथ पूरा करने तथा क्षमाभाव को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। नई मण्डी जिनालय में भगवान की सुन्दर अंग रचना की गई और संध्याकाल में सामूहिक आरती एवं भक्ति की गई।