तस्वीर में गंगापुर सिटी स्थित गुलकंदी देवी आदर्श विद्या मंदिर में आयोजित विचार-गोष्ठी के दौरान उपस्थित प्रबुद्धजन और वक्ता नजर आ रहे हैं।

विभाजन की विभीषिका को केवल अतीत की त्रासदी के रूप में नहीं, बल्कि मानवता, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता का महत्व समझने के अवसर के रूप में याद किया जाना चाहिए। अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, शाखा गंगापुर सिटी, जिला सवाई माधोपुर के युवा आयाम प्रकोष्ठ की ओर से विभाजन विभीषिका दिवस की पूर्व संध्या पर गुरुवार शाम गंगापुर सिटी स्थित गुलकंदी देवी आदर्श विद्या मंदिर में विचार-गोष्ठी आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के संभागीय संयोजक हनुमान मुक्त ने की। गोष्ठी का विषय “देश-विभाजन की विभीषिका एवं संघ की भूमिका” रहा।

वक्ताओं ने कहा कि 1947 का विभाजन केवल भारत के भूगोल का बँटवारा नहीं था, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, स्मृतियों और संबंधों पर लगा ऐसा गहरा घाव था, जिसकी पीड़ा आज भी अनुभव की जाती है।

अध्यक्षीय उद्बोधन में हनुमान मुक्त ने कहा कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने स्वतंत्रता से पूर्व ही देश की भावी परिस्थितियों तथा संगठित समाज की आवश्यकता को समझ लिया था। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ समाज की एकता और संगठन भी आवश्यक हैं। यदि समाज जाति, पंथ और वर्गों में बँटा रहेगा तो स्वतंत्रता का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। उन्होंने कहा कि विभाजन से पूर्व बढ़ती सांप्रदायिक कटुता ने भविष्य की भयावह परिस्थितियों के संकेत दे दिए थे।

मुख्य वक्ता अग्रवाल कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य डॉक्टर विजेंद्र सिंह गुर्जर ने विभाजन के दौरान हुए व्यापक विस्थापन और मानवीय त्रासदी का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सीमा के दोनों ओर लाखों लोगों को अचानक अपनी जन्मभूमि, घर, व्यवसाय और संपत्ति छोड़कर पलायन करना पड़ा। लाहौर और अमृतसर के बीच चलने वाली रेलगाड़ियों में यात्रियों की हत्या तथा शवों से भरी ट्रेनों के स्टेशनों पर पहुँचने जैसी घटनाएँ विभाजन की क्रूरता की साक्षी हैं। अनगिनत परिवार उजड़ गए और हिंसा, लूटपाट एवं महिलाओं पर अत्याचार की घटनाओं ने मानवता को शर्मसार कर दिया। ऐसी असहनीय पीड़ा के बीच देश को स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी।

साहित्य परिषद् के शाखा संयोजक एवं चर्चित साहित्यकार विशंभर पांडेय ‘व्यग्र’ ने कहा कि विभाजन के कठिन समय में संघ के स्वयंसेवकों ने अनेक स्थानों पर राहत शिविर लगाए तथा पीड़ितों की सेवा में दिन-रात कार्य किया। स्वयंसेवकों ने शरणार्थियों के लिए भोजन, वस्त्र, आवास और आवश्यक सामग्री की व्यवस्था करने के साथ अनेक विस्थापित परिवारों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाने में सहयोग दिया। उन्होंने कहा कि उस दौर में विभिन्न राष्ट्रीय नेताओं ने भी संघ से जुड़े राहत कार्यों की सराहना की थी। वैचारिक और राजनीतिक मतभेदों के कारण संघ की भूमिका पर समय-समय पर प्रश्न उठाए गए, लेकिन संगठन ने सेवा तथा राष्ट्रहित के कार्यों के माध्यम से उनका उत्तर दिया।

प्रख्यात व्यंग्यकार एवं साहित्य परिषद के जिला लोक साहित्य प्रमुख डॉ. मुकेश गर्ग ‘असीमित’ ने कहा कि भारत का विभाजन केवल किसी एक घटना, संगठन अथवा समुदाय के दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे ब्रिटिश शासन की औपनिवेशिक नीतियाँ, मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की माँग, कांग्रेस के सामने उपस्थित तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियाँ, बढ़ता सांप्रदायिक तनाव और सत्ता हस्तांतरण की जल्दबाजी सहित अनेक जटिल कारण थे। उन्होंने कहा कि विभाजन के समय सरकारी तंत्र के साथ अनेक सामाजिक, धार्मिक और स्वयंसेवी संगठनों ने राहत कार्य किए। संघ के स्वयंसेवकों ने भी विशेष रूप से पंजाब, दिल्ली और उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शरणार्थियों की सहायता की।

डॉ. गर्ग ने कहा कि विभाजन की स्मृतियों को किसी समुदाय के प्रति द्वेष उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि मानवता, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता समझने के लिए याद किया जाना चाहिए। राजनीतिक अथवा धार्मिक मतभेद जब नफरत में बदल जाते हैं, तो उसकी सबसे बड़ी कीमत सामान्य नागरिकों को चुकानी पड़ती है।

गोपाल गौशाला गंगापुर सिटी के कोषाध्यक्ष प्रमुख कृपाशंकर उपाध्याय ‘प्रीतम’ ने हिंदू समाज में बढ़ती जातिगत कटुता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि समाज को जातियों और वर्गों में बाँटने वाली प्रवृत्तियाँ उसकी एकता को कमजोर करती हैं। सामाजिक समरसता, परस्पर सम्मान और राष्ट्रीय एकता के माध्यम से ही ऐसी चुनौतियों का सामना किया जा सकता है।

साहित्य परिषद के जिला प्रचार प्रमुख अजय विद्रोही ने युवाओं से जाति, प्रांत और वर्ग के भेदभाव से ऊपर उठकर समाज तथा राष्ट्रहित में कार्य करने का आह्वान किया। उन्होंने युवाओं में बढ़ते वैचारिक भटकाव, सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाए जा रहे भ्रामक प्रचार तथा देवी-देवताओं और धार्मिक प्रतीकों के जानबूझकर किए जाने वाले अपमान पर चिंता व्यक्त की।

गोष्ठी में वक्ताओं ने सर्वसम्मति से कहा कि विभाजन की विभीषिका को स्मरण करने का उद्देश्य अतीत की कटुता को दोहराना नहीं, बल्कि इतिहास से सीख लेते हुए भविष्य में ऐसी त्रासदी की पुनरावृत्ति रोकना होना चाहिए। सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और मानवीय संवेदनाओं की रक्षा ही विभाजन के पीड़ितों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

बैठक में गुलकंदी विद्या मंदिर समिति के उपाध्यक्ष पूर्व सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य गोविंद गुप्ता, विमलचंद जैन, नवल किशोर, व्यवस्थापक कमलेश जोशी, गुलकंदी देवी आदर्श विद्या मंदिर की प्रधानाचार्य रश्मि शर्मा सहित नगर के अनेक प्रबुद्धजन उपस्थित रहे। विचार-विमर्श एवं सार्थक संवाद से गोष्ठी अत्यंत उपयोगी और उद्देश्यपूर्ण रही।

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